
इंद्र यादव/पालघर। मुंबई-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर महालक्ष्मी के पास जो दृश्य सामने आया, उसने सड़क निर्माण की गुणवत्ता और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगभग 620 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए मार्ग की कंक्रीट पहली ही बारिश में उखड़ गई और उसके भीतर लगी लोहे की सरिया सड़क की सतह से बाहर निकल आई। परिणामस्वरूप कुछ ही मिनटों में कई वाहनों के टायर फट गए और वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, करीब 10 से 12 मिनट के भीतर 15 से अधिक वाहन इस खराब सड़क का शिकार हो गए। सड़क से निकली सरिया ने वाहनों के टायरों को क्षतिग्रस्त कर दिया। कई वाहनों के सस्पेंशन और अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। राहत की बात यह रही कि इस घटना में कोई बड़ा जनहानि का मामला सामने नहीं आया। यह घटना केवल एक सड़क की खराब स्थिति का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि से किए गए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। जिस सड़क को वर्षों तक टिकाऊ और सुरक्षित माना जाना चाहिए था, वह पहली ही बारिश का सामना नहीं कर सकी। दुनिया के कई विकसित देशों, विशेषकर जापान और यूरोपीय देशों में सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण, तकनीकी मानकों और ठेकेदारों की जवाबदेही पर विशेष जोर दिया जाता है। वहीं भारत में अक्सर सड़क निर्माण के कुछ ही समय बाद सड़कें उखड़ने, गड्ढे बनने या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
620 करोड़ रुपये की लागत से तैयार सड़क से नागरिकों को सुरक्षित, टिकाऊ और विश्वस्तरीय आधारभूत सुविधा मिलने की अपेक्षा थी। लेकिन सड़क की सतह से लोहे की सरिया बाहर निकल आना निर्माण कार्य की गुणवत्ता, तकनीकी निरीक्षण और निगरानी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस हिस्से की मरम्मत नहीं की गई, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है। उनका कहना है कि सड़क निर्माण में हुई कथित लापरवाही की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए और यदि निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग या अनियमितता पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। सार्वजनिक धन से बनने वाली सड़कें नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा के लिए होती हैं, न कि उनके लिए खतरा बनने के लिए। ऐसे में यह आवश्यक है कि संबंधित एजेंसियां इस मामले की पारदर्शी जांच कर निर्माण गुणवत्ता सुनिश्चित करें, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और जनता का सार्वजनिक परियोजनाओं पर विश्वास बना रहे।



