
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पर्निया और साहिल के बीच चल रहे तीन वर्षीय बेटी की हिरासत के मामले में मां पर्निया के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि माना जाएगा, न कि धर्म को। न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल और न्यायमूर्ति श्रीराम मोदक की खंडपीठ ने पिता साहिल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मां आर्थिक रूप से सक्षम है और बच्ची की समुचित देखभाल कर सकती है। कोर्ट ने गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 17(2) के तहत कहा कि हिरासत के मामलों में धर्म पर विचार किया जा सकता है, पर यह निर्णय का प्रमुख आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मां की विदेशी नागरिकता के बावजूद बच्ची की अंतरराष्ट्रीय यात्रा कोर्ट की मंजूरी के बिना संभव नहीं होगी। साहिल द्वारा मोहम्मडन लॉ का हवाला देने पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का संदर्भ देकर बताया कि यदि मां के पास रहना बच्चे के हित में हो तो वही प्राथमिक संरक्षक मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के कल्याण के लिए उसकी उम्र, लिंग, धर्म, अभिभावक का चरित्र और बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव जैसे कई कारकों को देखा जाना चाहिए, धर्म इनमें से केवल एक है। यह फैसला भारत की धर्मनिरपेक्ष न्याय प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार मानकों के पालन की पुष्टि करता है, जहाँ हर निर्णय का केंद्र बिंदु बच्चे का सम्पूर्ण हित और विकास होता है।




