
देवेश प्रताप सिंह राठौर/झांसी, उत्तर प्रदेश। प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रो.सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भारतीय समाज को अपनी परंपरा, संस्कृति और संस्कारों को बिना किसी हीन भावना या संकोच के आगे बढ़ाना चाहिए। यदि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर और ज्ञान परंपरा को सहेजकर रखेंगे, तभी भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सकेगी। वे बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त सम्मान समारोह’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी का विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का प्रदेय” था। प्रो. जोशी ने अपने उद्बोधन की शुरुआत वैदिक मंत्र “तमसो मा ज्योतिर्गमय” से करते हुए कहा कि जो राष्ट्र अपने महापुरुषों का सम्मान नहीं करता, वह आगे बढ़ने की प्रेरणा भी खो देता है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त किसी भी दृष्टि से शेक्सपियर, टॉलस्टॉय या मोजार्ट जैसे विश्वप्रसिद्ध रचनाकारों से कम हैं? उन्होंने कहा कि जिस प्रकार विदेशों में लोग अपने महापुरुषों की जन्मस्थली और कर्मस्थली देखने जाते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक विद्यार्थी को चिरगांव जाकर मैथिलीशरण गुप्त की जन्मभूमि और कर्मभूमि का अवलोकन करना चाहिए तथा उसे वैश्विक पहचान दिलाने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके बचपन का बड़ा हिस्सा बुंदेलखंड में बीता है, इसलिए वे यहां की सांस्कृतिक विशेषताओं से भली-भांति परिचित हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, लोकसंस्कृति, दादी-नानी की कहानियों, लोकाचार और सामाजिक परिवेश में भी समाहित है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कृति ‘भारत-भारती’ में व्यक्त चिंताएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। डिजिटल युग में रचनात्मकता और मौलिकता को सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें, क्योंकि जड़ों से कटने वाला व्यक्ति अपनी पहचान खो देता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त की प्रत्येक रचना में राष्ट्रप्रेम और भारतीय संस्कृति की सुगंध है। उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को राष्ट्रकवि की जन्मस्थली और कर्मस्थली का भ्रमण कराया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी उनके जीवन और साहित्य से प्रेरणा ले सके। उन्होंने युवाओं के लिए रोजगारपरक शिक्षा एवं कौशल विकास के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता भी दोहराई। इस अवसर पर कुलपति प्रो. पाण्डेय ने मुख्य अतिथि, सारस्वत अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों को स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के दौरान सुमित कुमार मिश्रा की पुस्तक ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ का भी लोकार्पण किया गया। सारस्वत अतिथि प्रो. उमापति दीक्षित ने अपने उद्बोधन की शुरुआत शिवताण्डव स्तोत्र के पाठ से की, जिससे पूरा सभागार शिवभक्ति से सराबोर हो गया। उन्होंने कहा कि किसी आचार्य के विचारों को सुनना सौ पुस्तकों के अध्ययन के समान है। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध पंक्ति “नर हो, न निराश करो मन को” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष के समय आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, आयुर्वेद, महाभारतकालीन विज्ञान एवं प्राचीन भारतीय तकनीकी उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा आज भी शोध का विषय है और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। साहित्यकार अंकित सिद्धांत ने कहा कि ‘भारत-भारती’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय युवाओं में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री के ‘पंच प्रण’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की सबसे समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है और इसे विश्व पटल पर और प्रभावी ढंग से स्थापित करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कला संकाय अधिष्ठाता प्रो. पुनीत बिसारिया के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत सभी शोध-पत्रों का संकलन प्रकाशित किया जाएगा। सभी अतिथियों का पौध भेंट कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संचालन डा. अचला पाण्डेय ने किया तथा अंत में डा. श्रीहरि त्रिपाठी ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

