
कहते हैं, फिल्में हमारे समाज का आईना होती हैं। समाज में जो कुछ होता है, वह फिल्मों में परिलक्षित होता है। पीरियड या ऐतिहासिक फिल्में जितनी भी बनीं, एक भी ऐतिहासिक कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। काल्पनिकता हॉबी रही। मनमाने प्रसंग जोड़े गए। एक दौर शुरू हुआ था जब जीवन की वास्तविकता को रुपहले पर्दे पर दिखाया गया, लेकिन वह प्रयोग दीर्घकाल तक नहीं चला। हल्का-फुल्का रोमांस जरूर मिला। दुर्भाग्य यह कि जनता से जुड़े मुद्दों वाली फिल्में हमारे शासकों को पसंद नहीं आईं। इंदिरा गांधी के समय एक फिल्म बनी थी “मेरी आवाज़ सुनो” जिसे परदे पर आने के पहले ही बैन कर, सारे प्रिंट्स जला दिए गए। जिस फिल्म से सत्ता को लाभ मिलता हो, उसका प्रमोशन स्वयं प्रधानमंत्री करते हैं। “कश्मीर फाइल्स” कश्मीरी पंडितों पर हुए आतंकवादी अन्याय और कश्मीरी पंडितों के निर्वासित जीवन पर बनी थी। चूंकि वह हिंदू अस्मिता पर चोट की तरह थी, इसलिए सत्ताधारी दल का आशीर्वाद मिला। काबिले तारीफ़ थी वह फिल्म, जो सच का सामना कराती थी, लेकिन सत्तादल ने उसे वोट में भुनाने के एक मौके की भांति देखा। इसके बाद पूरी तरह काल्पनिक फिल्म आई—”द केरला स्टोरी”-जिसमें मुसलमानों द्वारा लव जिहाद के रूप में हिंदू लड़कियों को फंसाने और हत्या का चित्रण अतिशयोक्ति के रूप में किया गया था। सरकार ने उसका खुद प्रमोशन किया था और सभी को देखने के लिए प्रोत्साहित किया था। उसके बाद एक विवादास्पद फिल्म पूरी तरह काल्पनिक बनाई गई-“छावां” जिसमें मुगल सत्ता की क्रूरता दिखाई गई थी, जो पूरी तरह डायरेक्टर की कल्पना पर बनी थी, जिसका इतिहास से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। हिंदुओं में उत्तेजना और मुसलमानों के प्रति नफरत के भाव परिलक्षित हुए, जो कथित हिंदूवादी संगठनों के लिए मुफीद साबित हुई। गलत विवरण के चित्रांकन के लिए “छावां” फिल्म के डायरेक्टर को देश से क्षमा तक मांगने को बाध्य होना पड़ा, लेकिन हिंदूवादी संगठनों ने उसे अपने निहित स्वार्थ में खूब प्रचारित किया। अब एक फिल्म आई है, जो महाराष्ट्र के समाज सुधारक महात्मा फुले के जीवन वृत्त पर आधारित है। वह कालखंड था जब दलितों, विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा पूरी तरह बैन थी। महात्मा ज्योतिबा फुले और उनकी जीवन संगिनी ने लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोलकर शैक्षिक क्रांति ला दी थी। वैसे विपक्ष हमेशा ही बीजेपी पर आरोप लगती रही है कि मनुस्मृति को भारतीय संविधान को खत्म कर बीजेपी-आरएसएस लागू करना चाहती है या मंसूबे पाल रखी है। वह मनुस्मृति ब्राह्मणों को केवल भिक्षाटन करने का अधिकार देती है। लड़कियों को तो पूरी तरह शिक्षा से वंचित रखती है मनुस्मृति वाली व्यवस्था, जिसमें वर्णवाद है। लेकिन वर्ण निर्माण के बाद उच्च शिक्षित बनने और समाज में समरसता लाने में मनुस्मृति पूरी तरह फेल दिखती है। महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने कितना संघर्ष किया लड़कियों को शिक्षा दिलाने के लिए। उन पर व्यंग्य किए जाते थे, गोबर और कीचड़ फेंक दिए जाते थे। तमाम मुश्किलों का सामना कर फुले दंपत्ति ने लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त कर, जीवन में आगे बढ़ने और पुरुषों के समान ही कार्य करने के अधिकार दिलाने का कार्य किया। फुले ने ही बाल विवाह का विरोध किया था। फिल्म में ब्राह्मणवाद और मनुवाद पर आघात अवश्य किए गए हैं। सेंसर बोर्ड ने फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद उसमें कुछ भी गलत नहीं माना और फिल्म दिखाने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया, लेकिन कुछ हिंदूवादी संगठन आड़े हैं, चंद शब्द हटाने के लिए। इसीलिए पिछले शुक्रवार को फिल्म रिलीज नहीं हो पाई। अब आगे जरूर रिलीज होगी, भले ही चंद शब्द हटा दिए गए हों, लेकिन यह फिल्म दलितों के जीवन में बदलाव और जागृति लाने का कार्य अवश्य करेगी। “केरला स्टोरी” को खुद प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमोट किया था। प्रधानमंत्री पूरे देश के हैं, तो उन्हें समाज के सभी वर्गों के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। “केरला स्टोरी” के बाद अगर त्रावणकोर के राजा द्वारा गरीब तबके (जिनमें ब्राह्मण भी थे) की महिलाओं को घर में भले स्तन ढकने की अनुमति थी, लेकिन बाहर निकलने पर उनके स्तन खुले रखने का आदेश दिया गया था। स्तन ढकने पर, और स्तन बड़ा होने पर अधिक जुर्माना देने का कठोर आदेश था। वह अंग्रेजों के शासन का समय था, इसलिए ईसाई मिशनरियों ने उन महिलाओं को ईसाई बनने को प्रेरित किया था, लेकिन जब ईसाई बनने के बावजूद भी स्तन टैक्स जारी रखने का आदेश आया, तो लोग ईसाई नहीं बने। एक महिला, बेहद गरीब लेकिन खुद्दार—जिसे काल्पनिक नाम “नागेली” दिया गया—ने टैक्स देने के लिए अपने दोनों स्तन काटकर राजा के लोगों को दे दिए। कितना हृदय विदारक दृश्य रहा होगा वह? सोचकर ही सिहरन उत्पन्न हो जाती है। नागेली के बलिदान से दलित चेतना जाग उठी थी।संपूर्ण देश में तो नहीं, लेकिन महाराष्ट्र में दलितों को गले में मिट्टी का पात्र लटकाकर चलना होता था। यहां तक कि दलितों के पैरों के निशान भूमि पर न रहें, इसलिए दलितों को पीछे झाड़ू लटकाकर चलना पड़ता था। मंदिरों में देवदासियां होती थीं, जिनके साथ पुजारी अपनी हवस बुझाते थे। आज भी कई ऐसे संस्थान हैं, जिनमें मठाधीश की सेवा के लिए षोडश वर्षीया कन्याएं लगाई जाती हैं, जिन्हें उम्र ढलते ही दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया जाता है। यह ठीक है कि चंद उच्च जातियों के कुछ लोगों द्वारा दलितों पर जुल्म किए गए, लेकिन उनके अपराध के लिए आज की पीढ़ी को दोषी ठहराने की आवश्यकता नहीं है। इस बात को दलित अवश्य समझेंगे। कांग्रेस सरकारें नहीं चाहती थीं कि देश में कभी हिंदू, बौद्ध, मुसलमानों, सिखों, जैनियों और ईसाइयों के बीच भविष्य में टकराव हो, इसलिए “वर्शिप एक्ट” लाया गया, जिसमें आज़ादी के समय 1947 के पूर्व—पूजा स्थलों की जो स्थिति रही है, उसे कायम रखा जाए। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट आदेश दिया था कि बाबरी मस्जिद छोड़कर किसी भी पूजा स्थल के विरुद्ध कोई याचिका डाली नहीं जाए। लेकिन दर्प में भरकर जिस तरह बीजेपी की उन्मुक्त सरकारें मस्जिदों पर बुलडोजर चलवाकर तोड़ रही हैं, वे आगामी समय में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, जैनियों और सिखों में संघर्ष की वजह बनेंगी। कल बौद्ध मतावलंबी अपने बौद्ध विहारों और बौद्ध मंदिरों को मुक्त करने के लिए संघर्षरत होंगे। जबकि मांगे अभी से उठने लगी हैं। तब क्या देश में गृहयुद्ध शुरू नहीं हो जाएगा?सनातन धर्म, वेद, शास्त्र में कहीं भी मूर्ति पूजा का विधान नहीं है। अगर बौद्धों, पिछड़े, जैन, सिख समुदाय के लोगों ने सम्मिलित प्रयास शुरू कर दिए, तो हिंदुओं के कितने बड़े मंदिर शेष बचेंगे? सत्ता के मद में डूबी बीजेपी देश और देशवासियों का भविष्य दांव पर लगा रही है।




