HomeIndiaदृष्टिकोण: अवसरवादी राजनीति का बोलबाला

दृष्टिकोण: अवसरवादी राजनीति का बोलबाला

डॉ.सुधाकर आशावादी
इसे राजनीति का अवसरवादी चरित्र मानें या सत्ता सुख के लिए मन परिवर्तन, लेकिन राजनीति में दल बदल ऐसा हो गया है, जैसे किसी बिस्तर की चादर बदलना हो। पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में बगावत यही संकेत दे रही है, कि विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठावान बने रहने का स्वांग रचकर सत्ता की मलाई खाने वाले तत्वों का सत्ता से बेदखल होते ही मन परिवर्तित हो जाए, इसका पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है। राजनीति का यह दोगला चरित्र ही लोकतंत्र के लिए अभिशाप है।
दल बदल कानून अपनी जगह है और मन बदल अपनी जगह। बात केवल तृणमूल कांग्रेस में बगावत तक सीमित नहीं है। भारत में अवसरवादी राजनीति दशकों से की जा रही है। एक समय हरियाणा की राजनीति में आयाराम गयाराम चरित्र का बोलबाला था। उसके बाद कोई ऐसा दल नहीं बचा, जो अवसरवादी राजनीति का शिकार न बना हो। वस्तुस्थिति है, कि जैसे जैसे राजनीतिक दलों का कुनबा बढ़ता है, वैसे वैसे कुनबे को एकजुट रखना आसान कार्य नहीं रह जाता। जिस प्रकार बड़े परिवार को संगठित रखना सरल नहीं होता, उसी प्रकार राजनीतिक दलों में कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना सहज नहीं होता।
राजनीति में उच्च पद की चाह किसे नहीं होती, उच्च पदों तक पहुँचने के लिए साम दाम दंड भेद जैसे हथकंडे अपनाकर राजनीति को रोजगार बनाने वाले अवसरवादी तत्व जब राजनीति को अपना कारोबार बना लेते हैं, तब ऐसी स्थितिउत्पन्न होती ही है और राजनीतिक दलों में आंतरिक कलह होता है। कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य कोई राजनीतिक दल, सभी में ऐसी स्थिति कभी न कभी अवश्य बनी, जब सत्ता सुख भोगने की चाह में आया राम गया राम अपना असली चेहरा दिखाने के लिए विवश होते हैं। सभी राजनीतिक दलों के लिए सब दिन एक से नहीं रहते। कौन कह सकता था, कि आधी सदी तक देश की सत्ता में सिरमौर बनी रहने वाली कांग्रेस इतनी अस्तित्वहीन हो जाएगी, कि उसे क्षेत्रीय दलों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ेगा। कब किस राजनीतिक दल के दुर्दिन शुरू हो जाएं, कोई नहीं जानता। जनसाधारण को भ्रमित करके क्षेत्रीय दल सत्ता प्राप्त करते ही इतने घमंडी हो जाते हैं, कि सत्ता शीर्ष पर बने रहने का दंभ पाल लेते हैं,आगे चलकर यही दंभ उनके पतन का कारण बन जाता है। आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी इसी दंभ का शिकार हुई।
विधायकों और सांसदों का दल बदल कम बड़ी बात नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट भी राजनीति में महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए ही हुई। अब तृणमूल कांग्रेस भी इसका शिकार बनी है। यहाँ इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता, कि राजनीति में शुचिता की बात बेमानी है। राजनीति के हमाम में सभी वस्त्र हीन हो गए हैं। ऐसे में राजनीति का और कितना पतन होना है, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।

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