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मध्य रेलवे की नई पहल: घाट सेक्शन में मिट्टी का कटाव रोकेगी ‘वेटिवर घास’

मुंबई। मानसून के दौरान घाट सेक्शन में मिट्टी के कटाव, भूस्खलन और रेलवे ट्रैक पर मलबा व पत्थर गिरने की घटनाओं को रोकने के लिए मध्य रेलवे ने पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ तकनीक अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। मध्य रेलवे अब ‘वेटिवर घास’ (Chrysopogon zizanioides) आधारित बायो-इंजीनियरिंग तकनीक का इस्तेमाल कर घाट क्षेत्रों की ढलानों को प्राकृतिक रूप से मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसके तहत दक्षिण-पूर्व घाट सेक्शन में कुल 5300 वर्गमीटर क्षेत्र में पायलट स्तर पर वेटिवर घास का पौधरोपण किया गया है। मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. स्वप्निल नीला ने बताया कि भोर घाट के कर्जत-लोनावला और थाल घाट के कसारा-इगतपुरी रेलखंड मानसून के दौरान मिट्टी के कटाव, सतही जल बहाव, पत्थर गिरने और छोटे भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील हैं, जिससे सुरक्षित और निर्बाध रेल परिचालन के सामने गंभीर चुनौती पैदा होती है। इसे देखते हुए मध्य रेलवे वेटिवर घास का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है। वेटिवर को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त ‘वेटिवर सिस्टम’ के तहत प्रभावी बायो-इंजीनियरिंग पौधा माना जाता है। यह मिट्टी को स्थिर रखने, सतही जल के तेज बहाव को कम करने, बहकर आने वाली मिट्टी और गाद को रोकने तथा ढलानों को मजबूत बनाने में सहायक होता है। इस पौधे की खासियत इसकी मजबूत और गहराई तक जाने वाली जड़ें हैं। करीब 12 से 24 महीनों में इसकी जड़ें तीन से चार मीटर तक गहराई में पहुंच सकती हैं। जड़ों का घना और मजबूत जाल प्राकृतिक सुदृढ़ीकरण का काम करते हुए मिट्टी को बांधे रखता है। मध्य रेलवे के मुताबिक इससे मिट्टी की ‘शियर रेजिस्टेंस’ लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिससे मिट्टी खिसकने और उथले भूस्खलन का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। मध्य रेलवे ने दक्षिण-पूर्व घाट सेक्शन में तटबंधों की सुरक्षा के लिए दो स्थानों पर पायलट पौधरोपण किया है। खंडाला-मंकी हिल सेक्शन में अप लाइन के पास किलोमीटर 122/0 से 122/15 के बीच करीब 1050 वर्गमीटर क्षेत्र में वेटिवर लगाया गया है, जबकि ठाकुरवाड़ी केबिन-पलसधरी सेक्शन में मिड लाइन के पास किलोमीटर 106/600 से 106/700 के बीच 4250 वर्गमीटर क्षेत्र में पौधरोपण किया गया है। इस तरह कुल 5300 वर्गमीटर क्षेत्र को पायलट परियोजना के दायरे में लिया गया है। घाट क्षेत्रों में रेलवे कटिंग और तटबंधों की ढलानों पर वेटिवर घास को कंटूर लाइन में लगाया जा रहा है। इसकी गहरी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जबकि जमीन के ऊपर मौजूद घनी घास सतही पानी के तेज बहाव को धीमा करने के लिए प्राकृतिक अवरोध का काम करती है। इससे मिट्टी में गहरी नालियां बनने से रोकने, पानी को जमीन में समाहित होने में मदद करने और बहकर आने वाली गाद को रोकने में सहायता मिलती है। समय के साथ जमा हुई मिट्टी प्राकृतिक सीढ़ीनुमा संरचना तैयार करती है, जिससे ढलानों को अतिरिक्त स्थिरता मिलती है। मध्य रेलवे का मानना है कि इस प्रकृति आधारित तकनीक से घाट सेक्शन में मिट्टी के कटाव और ढलानों की अस्थिरता को कम करने के साथ ट्रैक पर पत्थर एवं मलबा गिरने की घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी। इससे मानसून के दौरान सुरक्षित, संरक्षित और समयबद्ध रेल परिचालन सुनिश्चित करने में मदद मिलने के साथ पारंपरिक सुरक्षा कार्यों पर होने वाला रखरखाव खर्च भी कम हो सकेगा। मध्य रेलवे ने कहा कि चुनौतीपूर्ण और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घाट सेक्शन में पारंपरिक इंजीनियरिंग उपायों के साथ वेटिवर जैसी प्रकृति आधारित बायो-इंजीनियरिंग तकनीक को जोड़कर ढलानों और तटबंधों की मजबूती बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि हर मौसम में सुरक्षित रेल परिचालन, यात्रियों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

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