
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्लम पुनर्वास (SRA) योजनाओं के तहत आवंटित फ्लैटों के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई लाभार्थी कानूनी रूप से निर्धारित पांच वर्ष की लॉक-इन अवधि के दौरान अपने पुनर्वास फ्लैट का कब्ज़ा किसी अन्य व्यक्ति को सौंप देता है, तो इसे भी फ्लैट का अवैध हस्तांतरण (ट्रांसफर) माना जाएगा, भले ही बिक्री, लीज़ या अन्य किसी प्रकार का पंजीकृत दस्तावेज़ (रजिस्टर्ड डीड) मौजूद न हो। न्यायमूर्ति अमित बोरकर ने कहा कि महाराष्ट्र स्लम एरियाज़ (इम्प्रूवमेंट, क्लियरेंस एंड रीडेवलपमेंट) एक्ट, 1971 की धारा 3E के तहत पुनर्वास फ्लैट को आवंटन के बाद शुरुआती पांच वर्षों तक बिक्री, उपहार, अदला-बदली, लीज़ या किसी अन्य तरीके से हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून में प्रयुक्त “या किसी अन्य तरीके से” शब्दों की व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कब्ज़ा सौंपना भी शामिल है। अदालत ने यह टिप्पणी छाया शिंदे की याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित बेदखली के आदेश को चुनौती दी थी। रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2008 में उन्हें SRA योजना के तहत फ्लैट आवंटित किया गया था, लेकिन बाद में शिकायत मिलने पर 2015 में हुई जांच में फ्लैट में एक अन्य महिला निवास करती मिली, जिसने स्वयं को किरायेदार बताया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि बिक्री या लीज़ का कोई पंजीकृत दस्तावेज़ मौजूद नहीं है, इसलिए धारा 3E लागू नहीं होती। हालांकि, अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने हितेशी टैंक नामक व्यक्ति के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी और उसे फ्लैट के कब्ज़े का अधिकार दिया गया था। बाद में निरीक्षण में फ्लैट में किरायेदार का पाया जाना इस बात का पर्याप्त आधार था कि वास्तविक कब्ज़ा तीसरे व्यक्ति को सौंपा जा चुका था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल पंजीकृत दस्तावेज़ का अभाव किसी व्यक्ति को कानून के उल्लंघन से मुक्त नहीं कर सकता। मामले में मूल पात्रता और एनेक्सर-II में नाम शामिल किए जाने को लेकर लगाए गए कथित धोखाधड़ी के आरोपों पर अदालत ने टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि वे अलग कार्यवाही का विषय हैं और वर्तमान विवाद केवल धारा 3E के उल्लंघन तक सीमित है। अंततः हाई कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित बेदखली के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि लॉक-इन अवधि के दौरान पुनर्वास फ्लैट का वास्तविक कब्ज़ा किसी अन्य व्यक्ति को देना भी कानून का उल्लंघन माना जाएगा।

