
अंजनी सक्सेना
विश्व वंदनीय भगवान महावीर के जीवन एवं दर्शन का गहराई से अध्ययन करते हुए हम पाते हैं कि वे किसी एक जाति,वर्ग या सम्प्रदाय के न होकर सम्पूर्ण मानव समाज की अमूल्य धरोहर हैं। वह सबके थे और सब उनके थे। जिस समय भगवान महावीर का अवतरण हुआ, दुनिया में हिंसा एवं अत्याचार का बोल-बाला था। महावीर स्वामी ने विषम परिस्थितियों में दुनिया को सत्य और अहिंसा का सच्चा मार्ग दिखलाया। भगवान महावीर एक युग पुरुष, युग दृष्टा, एवं महामानव थे। अहिंसा के महावतार भगवान महावीर का जन्म बिहार प्रांत के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला के यहां हुआ था। वे जैन धर्म के 24वेंं तीर्थकर थे। क्षत्रिय राजकुमार होने के बावजूद भी उन्होंने कभी विश्वविजय का सपना नहीं देखा। भगवान महावीर ने सन्यासी बनकर राजपाट, वैभव का त्याग कर 12 वर्ष 6 माह मौन धारण कर तपस्या कर कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति की। आपने प्राणी मात्र के सुख के लिये जिओ और जीने दो का अमूल्य मंत्र दिया। भगवान महावीर ने कहा जो अपनी अंतर आत्मा को जीतने में सफल हो जाता है वही सच्चा वीर कहलाता है। संसार में जैन धर्म अहिंसा, शांति, प्रेम और मैत्री का अमर संदेश लेकर आया है। विश्व प्रेम ही भगवान महावीर का दिव्य संदेश है। भगवान महावीर के इसी सिद्धांत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन का मूल मंत्र माना था। उनका कथन था पाप से घृणा करो,पापी से नहीं। उन्होंने विरोधी को कभी विरोध से नहीं वरन् सद्भावना एवं शांति से जीता। भगवान महावीर के इस सृष्टि पर अनन्त उपकार हैं, वह जिन थे, जिन का अर्थ होता है विजयी। उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति या देश को नहीं जीता, उन्होंने जीता अपने ही अंदर छिपे शत्रुओं को। उन्हें जीता ही नहीं, अपितु उन्हें जीतने का सबको मार्ग भी बताया। अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य ही वह मार्ग है, जिस पर चलने वाला अपने अन्तरंग शत्रुओं को जीत सकता है। भगवान महावीर ने कहा कि आत्मा के तीन बड़े शत्रु हैं, काम, क्रोध और लोभ। इनके चक्कर में पड़ा हुआ व्यक्ति जीवन में कभी अच्छे कार्य नहीं कर पाता। स्वकल्याण के लिये इन पर विजय प्राप्त करना बहुत आवश्यक है। वह स्वयं क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए थे, उनके मुख्य गणधर इंद्रभूमि गौतम ब्राहण थे तथा उनकी धर्म सभा (समवशरण) में सभी धर्मों और जातियों के लोग उन्हें सुनने के लिए आते थे उन्हें केवल जैनों या जैन मंदिरों तक सीमित रखना उनके विशाल एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति अन्याय है। वह जैन नहीं जिन थे। जो इन्द्रियजन्य वासनाओं और मनोजन्य कषायों को जीत लेते हैं, वे कहलाते हैं जिन। किसी का कल्याण जैन बनकर नहीं, जिन बनकर ही हो सकता है। भगवान महावीर ने कहा है त्याग व तपस्या से जीवन महान बनता है। श्रावकों को अपने आचरण में अहिंसा तथा जीवन में अपरिग्रह रखना चाहिए। युगदृष्टा, अहिंसा, करुणा, परोपकार की पावन प्रेरणा देने वाले भगवान महावीर के जन्मोत्सव के पुनीत अवसर पर हमें चिंतन करने की आवश्यकता है। वर्तमान में विश्व में बढ़ रही हिंसा की प्रवृति पर अंकुश लगाने भगवान महावीर के सिद्घांत प्रासंगिक हैं। महावीर के सिद्धांत प्राणीमात्र के लिए हितकारी हैं। वर्तमान में दुनिया भर में राजनेताओं की कथनी और करनी मेंं अंतर है जबकि राजनेताओं की कथनी और करनी में समानता और एकरुपता होना चाहिये। विश्व में आज अहिंसा और प्रेम के स्थान पर हिंसा और नफरत का वातावरण बनाया जा रहा है। सत्ता और धन ही सब कुछ हो गया है। देश हित और आदर्श की बातें करने वाले ही यह सब कुछ कर रहे हैं। हजारों वर्ष की तपस्या के बाद जिन मूल्यों की स्थापना हुई है, उन्हें नष्ट किया जा रहा है। त्याग, सेवा, परोपकार के मार्ग पर चलने के बजाए सभी अपने-अपने स्वार्थों को पूरा करने में लिप्त हो गये हैं। वर्तमान में नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार देने के स्थान पर उन्हें गुमराह किया जा रहा है, नई पीढ़ी भगवान महावीर की संस्कृति एवम् संस्कारों से विमुख होकर अपसंस्कारों की संस्कृति का अनुकरण कर रही है। दुनिया में सुख शांति की स्थापना करने के लिए हमें हर कीमत पर भगवान महावीर के बताये मार्ग पर चलना होगा। तभी शांति की प्राचीन परम्पराओं और विरासत की रक्षा होगी। भारत ने हिंसा में कभी भी विश्वास नहीं किया। हमारा विश्वास भगवान महावीर के सिद्धांतों पर चलकर दूसरों की जान लेकर जीने में नहीं वरन् अपनी जान की बाजी लगाकर दूसरों की रक्षा करने में है। वर्तमान परिस्थिति में भगवान महावीर द्वारा बताये गये मार्ग का अनुसरण करने में ही हम सबका कल्याण है।




