Monday, May 25, 2026
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बीएमसी में ‘कंसल्टेंट राज’ पर बवाल: पार्षदों ने पूछा — अपने इंजीनियर निकम्मे हैं क्या?

मुंबई। देश की सबसे अमीर नगर निगम कही जाने वाली बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) एक बार फिर करोड़ों रुपये की कंसल्टेंसी व्यवस्था को लेकर विवादों में घिर गई है। बीएमसी की स्थायी समिति में शुक्रवार को उस समय तीखा हंगामा देखने को मिला जब नगर निगम प्रशासन द्वारा बाहरी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स (PMC) पर लगातार बढ़ती निर्भरता पर पार्षदों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए। पार्षदों का आरोप था कि बीएमसी प्रशासन जानबूझकर नगर निगम के अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी अधिकारियों की उपेक्षा कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा रहा है, जिससे जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। बैठक में कई महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं से जुड़े कंसल्टेंसी प्रस्ताव रखे गए थे, लेकिन विरोध इतना तीखा हुआ कि कई प्रस्तावों को रोकना पड़ा। समिति के सदस्यों ने साफ कहा कि यदि बीएमसी के पास खुद तकनीकी विशेषज्ञ और इंजीनियर मौजूद हैं, तो फिर हर बड़े प्रोजेक्ट के लिए बाहरी सलाहकारों की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है। दरअसल, पीएमसी यानी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स का काम परियोजनाओं के क्रियान्वयन, तकनीकी सलाह और मॉनिटरिंग से जुड़ा होता है। लेकिन बीएमसी में यह व्यवस्था अब “सलाह” से आगे बढ़कर “निर्भरता” का रूप ले चुकी है। यही कारण है कि पार्षदों ने इसे “कंसल्टेंट राज” करार दिया। इस महीने की शुरुआत में भी स्थायी समिति ने पिसे-पंजरापुर जल शुद्धिकरण परियोजना के लिए 23.35 करोड़ रुपये के कंसल्टेंसी प्रस्ताव को रद्द कर दिया था। यह परियोजना मुंबई की बढ़ती जल जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई जा रही है, जिसके तहत शहर की जल शुद्धिकरण क्षमता में 910 एमएलडी की अतिरिक्त वृद्धि की योजना है। लेकिन समिति का मानना था कि सिर्फ सलाहकार नियुक्त करने के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च करना उचित नहीं है। शुक्रवार को जिन नई परियोजनाओं पर विवाद हुआ उनमें भांडुप स्थित मनोरी विलवणीकरण परियोजना का 2,000 एमएलडी क्षमता वाला पंपिंग स्टेशन और गुंडावली जलाशयों से जुड़ी 3,000 मिमी पाइपलाइन परियोजना प्रमुख थीं। नागरिक रिकॉर्ड्स के अनुसार प्रशासन लगभग सभी बड़े अनुबंध एक ही कंसल्टेंट को देने की तैयारी कर रहा था। इस पर पार्षदों ने सवाल उठाते हुए कहा कि इससे पारदर्शिता और निष्पक्षता दोनों प्रभावित होती हैं। यशोधर फानसे ने बैठक में तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि अगर हर काम के लिए निजी सलाहकार ही रखने हैं, तो फिर बीएमसी के इंजीनियर आखिर किस काम के लिए नियुक्त किए गए हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन धीरे-धीरे नगर निगम की आंतरिक तकनीकी क्षमता को कमजोर कर रहा है। वहीं गणेश खांकर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि “जिस तरह से कंसल्टेंट्स पर निर्भरता बढ़ रही है, ऐसा लगता है कि जल्द ही नगर निगम का बजट भी वही बनाकर देंगे।” उनके इस बयान पर समिति में हलचल मच गई। स्थायी समिति के अध्यक्ष प्रभाकर शिंदे ने प्रशासन को फटकार लगाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि कंसल्टेंट्स की नियुक्ति केवल उन्हीं मामलों में की जाए जहां अत्यधिक विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता हो। उन्होंने कहा कि बीएमसी को सबसे पहले अपने इंजीनियरों और तकनीकी अधिकारियों की क्षमता पर भरोसा करना चाहिए और बाहरी एजेंसियों को केवल अपवाद स्वरूप ही नियुक्त करना चाहिए। यह पूरा विवाद केवल तकनीकी नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मुंबई की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। बीएमसी पर पहले भी बड़े प्रोजेक्ट्स में लागत बढ़ाने, निजी एजेंसियों को लाभ पहुंचाने और जवाबदेही से बचने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में अब स्थायी समिति की यह सख्ती प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश मानी जा रही है कि जनता के पैसे से चलने वाली परियोजनाओं में मनमानी और अपारदर्शिता अब आसानी से नहीं चल पाएगी।

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