Sunday, April 19, 2026
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भारतीय लोकतंत्र और महिला आरक्षण की अधूरी यात्रा

विवेक रंजन श्रीवास्तव
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और समावेशिता है लेकिन जब लोकसभा में ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का संविधान संशोधन वर्षों तक पारित नहीं हो सका, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में आधी आबादी को बराबरी का अवसर देने की इच्छा रखता है। महिला आरक्षण विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि यह भारतीय राजनीति में समानता और न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम होता। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें मिलतीं तो उनकी आवाज़ अधिक मज़बूती से गूँजती। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर नीतियाँ अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बनतीं। आज भी संसद में महिलाओं की संख्या 15 प्रतिशत से कम है। यह आँकड़ा बताता है कि लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी कितनी सीमित है। आरक्षण से यह अंतर मिटाने का अवसर मिलता। विधेयक पारित न हो पाने के पीछे कई कारण रहे जिनमें राजनीतिक असहमति प्रमुख है। कुछ दलों ने जनगणना आधारित सीटों के पुनर्वितरण (परिसीमन) पर आपत्ति जताई। सपा जैसे कुछ दलों को आशंका थी कि आरक्षण से उनके पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित होंगे, इसलिए वे विरोध में रहे। ऐसे कई कारणों ने मिलकर एक ऐतिहासिक अवसर का गर्भपात कर दिया। 2023 में लंबे संघर्ष और बड़ी बहस के बाद संसद ने आखिरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कर दिया था। इसमें यह प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें मिलेंगी, लेकिन यह आरक्षण परिसीमन (delimitation) और जनगणना के बाद ही लागू होगा। इस शर्त ने इसे एक अधूरी जीत बना दिया है, क्योंकि वास्तविक प्रभाव तब तक नहीं दिखेगा जब तक नई जनगणना और सीटों का पुनर्वितरण पूरा नहीं होता। 2024 के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी, लेकिन प्रतिनिधित्व अब भी सीमित रहा। महिला संगठनों ने 2023 के विधेयक को “ऐतिहासिक लेकिन अधूरा” कहा। कई राजनीतिक दलों ने इसे समर्थन दिया, पर साथ ही यह मांग भी उठी कि इसे शीघ्र लागू किया जाए ताकि केवल कागज़ी प्रावधान न रह जाए। पहले महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना और फिर विलंबित रूप से पारित होना कई स्तरों पर असर डालता है। महिला नेतृत्व का अवसर फिलहाल टल गया लगता है। महिला संगठनों और नागरिक समाज में गहरी निराशा है। राजनीतिक दलों पर इसे शीघ्र लागू करने का दबाव बढ़ेगा। लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना केवल एक विधायी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसमें राजनीति व्यापक राष्ट्रहित से बड़ी सिद्ध हुई। जब तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तब तक नीतियाँ समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएँगी। भारत की आधी आबादी को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। वर्तमान परिस्थितियां हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारी राजनीति वास्तव में समावेशी है। महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक चुनौती है। यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर इस मुद्दे पर सहमति बनाएँ। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देना भारतीय लोकतंत्र को अधिक सशक्त, न्यायपूर्ण और संतुलित बनाएगा और आज नहीं तो कल यह होकर रहेगा, क्योंकि यही जन आकांक्षा है। 

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