
कांग्रेस अच्छी रही या खराब, इसकी बात नहीं होगी। बीजेपी द्वारा लगाए गए कांग्रेस पर सारे घोटाले व्यर्थ साबित हुए, क्योंकि बीजेपी सरकार बारह वर्षों में भी कांग्रेस के घोटालों का प्रमाण नहीं दे पाई। यह अलग है कि अन्ना हजारे को मोहरा बनाकर रामलीला मैदान में रासलीला रची गई, जिसके लिए धन कहां से आया—यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कई बार दोहरा चुके हैं कि वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए इंडिया को हजारों करोड़ रुपए अमेरिका ने दिए थे। इजरायल की बिसात और अमेरिकी रणनीति भारत की पिच पर बिछाकर शतरंज खेला गया, जिसमें मोहरा बने अन्ना हजारे। उसी आंदोलन की उपज है आम आदमी पार्टी, जिसके संयोजक ने अपने खास पैरोकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब एक युवा राज्यसभा सांसद निशाने पर है। अन्ना आंदोलन को बीजेपी और आरएसएस ने प्राणवायु दी और कांग्रेस सरकार अगले ही चुनाव में खत्म हो गई। सियासत आज भी “कांग्रेस मुक्त भारत” के इर्द-गिर्द घूम रही है।हम भारतीय बहुत जल्दी भूलने की बीमारी से पीड़ित हैं। विदेश में जमा काला धन आ गया, सबके खाते में 15 लाख पहुंच चुके हैं, सौ स्मार्ट सिटी बन गईं, काशी क्वेटा बन गया, किसानों की आय दोगुनी हो गई—ऐसे दावे बार-बार किए गए। बेमौसम कृत्रिम वर्षा कराकर भारत के किसानों की कमर टूट गई, लेकिन जनता यह नहीं जान सकी कि वर्षा और ओले किसने गिराए। किसानों की आय चार गुना बढ़ने के दावे भी किए गए, लेकिन बीज, खाद और कीटनाशकों की कीमतें क्यों बढ़ती चली गईं, इसका जवाब नहीं मिला। कांग्रेस को भले ही भ्रष्ट कहा गया, लेकिन उसने जनता को नोटा का अधिकार दिया, ताकि अगर सभी प्रत्याशी अयोग्य लगें तो जनता अपनी असहमति जता सके। बड़े-बड़े घोटालों के आरोप भले सिद्ध न हुए हों, लेकिन कांग्रेस ने आरटीआई के माध्यम से जनता को शासन-प्रशासन से सवाल पूछने का अधिकार दिया। जवाब न देने पर अधिकारियों को दंडित करने का प्रावधान था। कई अधिकारी सस्पेंड हुए, आर्थिक जुर्माने लगे—यह सब देखा गया। लेकिन जब से “जीरो टॉलरेंस” वाली सरकार आई, विपक्षी नेताओं पर सीबीआई और ईडी की कार्रवाई बढ़ी। जैसे ही वे नेता बीजेपी में शामिल हुए या सहयोगी बने, जांच धीमी पड़ गई या खत्म हो गई—ऐसे आरोप लगातार लगते रहे हैं। ईडी के अधिकांश मामलों के साबित न हो पाने की बात भी सामने आती रही है। बीजेपी सरकार पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि उसने धीरे-धीरे आरटीआई को कमजोर किया। पीएम केयर फंड के संदर्भ में जानकारी नहीं मांगी जा सकती, मंत्री से लेकर छोटे अधिकारी तक की संपत्ति की जानकारी सीमित हो गई। व्यक्तिगत डेटा संरक्षण के नाम पर पारदर्शिता कम होने की बात कही जाती है। जबकि पहले सेना जैसे सीमित विषय ही गोपनीय माने जाते थे। पीएम केयर फंड, जिसमें कई सरकारी विभागों से बड़ा योगदान लिया गया, उसे निजी स्वरूप देने का मुद्दा भी बहस में रहा है। जहां पहले आम नागरिक सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के जरिए न्याय की उम्मीद कर सकता था, वहीं अब इस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि सरकार PIL के दायरे को सीमित करना चाहती है, जिससे आम नागरिक के लिए न्याय और कठिन हो जाएगा। यह भी कहा जाता है कि सरकार संसद के बहुमत के दम पर ऐसे कानून बना देती है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को निष्प्रभावी कर देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन बना हुआ है? अटल बिहारी वाजपेयी का कथन आज भी याद आता है—“अगर तुम अपनी पसंदीदा पार्टी की गलतियों पर चुप हो, तो तुम देशभक्त नहीं, बल्कि पार्टी-भक्त हो।” पार्टियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश हमेशा रहना चाहिए। आज सवाल केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष का नहीं है, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र का है। क्या 543 सांसदों में एक भी ऐसा नहीं जो अन्याय के खिलाफ खुलकर आवाज उठा सके? देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि जनता भी जागरूक हो, जाति, धर्म, भाषा और प्रांत के नाम पर वोट न दे, बल्कि योग्य, ईमानदार और जनहित में काम करने वाले प्रतिनिधियों को चुने। पड़ोसी देश नेपाल से भी सीखने की बात कही जाती है, जहां युवा आंदोलन के बाद युवाओं की भागीदारी बढ़ी और फैसले तेजी से लिए गए। अगर जनता चाहे, तो वह बदलाव ला सकती है—चाहे वह नेतृत्व में हो या व्यवस्था में।




