Thursday, March 19, 2026
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गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 मार्च बलिदान दिवस, पत्रकार लिखते ही नहीं हैं शहीद भी होते हैं

दिनेश चंद्र वर्मा
आज जब पत्रकारिता मात्र व्यवसाय में परिवर्तित हो गई है, तब यह प्रश्न भी उठता है कि क्या पत्रकारों का काम लिखना मात्र ही है? इस प्रश्न का उत्तर दुनिया के अन्य देशों के पास हो ना हो, भारत की पत्रकारिता के पास अवश्य है। भारत में पत्रकारिता का उद्भव और विकास केवल लिखने के लिये नहीं हुआ, अपितु भारतीय पत्रकारिता ने शहादत के सुनहरे अध्याय भी लिखे हैं। स्व.गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन और बलिदान इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
बलिदानी पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी इसी दृष्टि से न केवल भारतीय पत्रकारिता के अपितु विश्व पत्रकारिता के प्रेरणापुंज बन गये हैं। वस्तुत: उनका जीवन पत्रकारिता का ऐसा आदर्श है, जिसमें तत्कालीन समाज, देश और काल का आवश्यकताओं का संपूर्ण समावेश था। राष्ट्र और समाज के लिये अपने जीवन की आहुति देकर विद्यार्थी जी ने जो उदाहरण उपस्थित किया है, वह पत्रकारों के लिये ही नहीं अपितु देश और समाज के लिये भी एक अनुपम उदाहरण है।विदिशा और मुंगावली में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात गणेश शंकर जी को विद्या अध्ययन हेतु अपने बड़े भाई श्री शिवव्रत नारायण के पास कानपुर जाना पड़ा। कानपुर के क्राइस्ट चर्च कालेज से उन्होंने उच्च श्रेणी में एन्ट्रेन्स परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद विद्या अध्ययन हेतु वे इलाहाबाद गये। इलाहाबाद में उनकी भेंट कर्मवीर सुंदरलाल जी से हुई। फलस्वरूप विद्यार्थी जी सुंदरलाल जी के पत्र कर्मयोगी के अतिरिक्त स्वराज्य में भी राजनीति और क्रांतिकारी लेख लिखने लगे। इन लेखों में स्वतंत्रता के प्रति उनकी तड़प उजागर होती थी। इसके उपरांत उन्होंने सरस्वती में उपसंपादक का कार्य करना शुरू किया। इलाहाबाद में सरस्वती में काम करने के साथ उनका महान पत्रकार, समाजसेवी एवं राजनेता पंडित मदनमोहन मालवीय से संपर्क हुआ। मालवीय जी से प्रभावित होकर विद्यार्थी जी ने अभ्युदय नामक समाचार पत्र में काम करना शुरू किया, जो स्वयं मालवीय जी निकालते थे। इस अवधि में उनका देश के क्रांतिकारियों से भी संपर्क हुआ। सरदार भगत सिंह, विद्यार्थी जी को अपना गुरू मानते थे। चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव और राजगुरू सरीखे अमर क्रांतिकारियों से विद्यार्थी जी के इस अवधि में निकट संबंध रहे। दूसरी ओर अहिंसा के मार्ग से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय नेताओं से भी उनके मधुर संबंध थे। गांधीजी उन्हें अहिंसा का पुजारी कहते थे। अभ्युदय में विद्यार्थी जी को बीस रुपये मासिक वेतन मिलता था, पर इसके बदले में उन्हें रात-दिन मेहनत करनी पड़ती थी। अधिक मेहनत के कारण विद्यार्थी जी बीमार हो गये और काफी समय तक अस्वस्थ रहे। बीमारी से उठने के बाद विक्रमी संवत् 1970 की देवोत्थान एकादशी अर्थात 9 नवम्बर 1913 को विद्यार्थी जी ने कानपुर से प्रताप का प्रकाशन एवं संपादन प्रारंभ किया। प्रताप उन दिनों राष्ट्रीयता और देशभक्ति का प्रतीक पत्र था। उसके प्रथम पृष्ठ पर यह पंक्तियां अंकित रहती थी।जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है।

प्रताप पहले साप्ताहिक समाचार पत्र था, पर वह जनता में इतना लोकप्रिय हो गया कि सात वर्ष बाद वह दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। प्रताप ने देशभक्ति का जो उद्घोष किया उससे विद्यार्थी जी अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गये। उन्हें पांच बार जेल यात्रा करनी पड़ी। प्रताप उन दिनों देश के स्वतंत्रता संग्राम की धुरी में परिवर्तित हो चुका था। विद्यार्थी जी और उनका प्रेम क्रांतिकारियों के लिये शरणस्थली था। श्री भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, शचिंद्र सान्याल, रामेंद्र लाहिड़ी एवं अशफाक उल्ला आदि क्रांतिकारी महीनों तक प्रताप प्रेस में ही रहते थे तथा क्रांति की योजनायें बनाते थे।
अंग्रेज भारत की आजादी की लड़ाई का मुकाबला फूट डालो और राज करो की कलुषित कूटनीति से कर रहे थे। इसी कूटनीति के फलस्वरूप सन् 1931 में कानपुर में भयानक दंगा फैल गया। 9 मार्च सन् 1931 को विद्यार्थी जी जेल से छूटे और रात दिन इन दंगों में सांप्रदायिक सद्भावना स्थापित करने के लिये अथक परिश्रम करते रहे। पूरे कानपुर शहर में मारकाट मची हुई थी। मकान जल रहे थे। ऐसी ही हालत में विद्यार्थी जी दो अन्य समाजसेवी ज्वाला दत्त और शंकर राव कालीगार के साथ दंगाग्रस्त क्षेत्रों में अमन-चैन के प्रयास कर रहे थे। कानपुर के बकरमंडी क्षेत्र में एक परिवार को बचाने का जब वे प्रयास कर रहे थे तब दो सौ से अधिक आतताईयों ने उन पर प्राणघातक हमला कर दिया और इस तरह विद्यार्थी जी राष्ट्र के लिये और समाज के लिये शहीद हो गये। अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी की मौत को बिल्कुल गुप्त रखा था। कानपुर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी उनके अंतिम संस्कार में भारी संख्या में लोग शामिल हुए और इसी शहादत ने यह सिद्ध कर दिया कि पत्रकार केवल लिखते ही नहीं बल्कि, देश, समाज और सांप्रदायिक एकता के लिये शहीद भी होते हैं।

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