
अगर किसी अच्छे कार्य का कोई श्रेय लेना चाहता हो तो उसके बुरे काम की भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। फिर क्या कारण है कि पहले शासन और प्रशासन ने खुद हिंदुओं की श्रद्धा बढ़ाने के लिए धुआंधार प्रचार किया। चालीस से पचास लाख श्रद्धालुओं को कुंभ स्नान करने का आंकड़ा सार्वजनिक कर व्यवस्था चाक-चौबंद करने की बात कही और जब भगदड़ मची तो भगदड़ से ही इनकार करने लगे। पचासों ट्रकों और ट्रैक्टरों में जमीन पर गिरे कपड़े, चप्पलों को भरकर ले जाया गया, जिसका मतलब है सैकड़ों की संख्या में लोग मरे गए। अखिलेश यादव ने तो दो हजार श्रद्धालुओं के मरे होने की बात सदन में कही। उद्धव गुट ने भी मरने वालों की सही संख्या बताने की बात कही। बहुत देर बाद तीस के मरने की बात प्रशासन ने स्वीकार किया, लेकिन टीवी 9 के पत्रकार को मोर्चरी में जाकर हकीकत जानने से रोकना, धक्का-मुक्की करना और लापता या मृत लोगों के संबंधितों से पत्रकार के द्वारा बात करने से मना करने से स्पष्ट है कि मृतकों की संख्या हजारों न सही, सैकड़ों में जरूर होगी। शव लेने आए परिजनों से शव देने के बदले लिखवाया जाना कि “स्वाभाविक मृत्यु हुई” संदेह को पक्का करने के लिए उपयुक्त है। झूंसी में भगदड़ के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, प्रशासन ने जे.सी.बी. से लाशें उठवाकर मिट्टी खोदकर दबाने के आरोप लगाए। बिना आग के धुआं नहीं उठता। मृत परिजनों का पोस्टमार्टम न कराना और टीवी 9 द्वारा आजमगढ़, जौनपुर और ग्वालियर के परिजनो के दावे की उनसे सादे पेपर पर लिखवाकर लिया गया कि भगदड़ में नहीं, स्वाभाविक रूप से बीमार होने के कारण मृत्यु हुई। सबसे अहम बात, गाजीपुर के पुलिस अधिकारी जिनकी ड्यूटी संगम नोज पर लगी थी, उन्होंने इलाहाबाद में कंपटीशन की तैयारी करने वाले अपने राय चच्चा के द्वारा फोन करके बताया कि मेरी तबीयत बेहद खराब है, लेकर चल मुझे यहां से और जब उसके पिता थाने में पहुंचे तो पुलिसकर्मी मृत मिला। वह बीमार भी नहीं रहे। बताया गया कि भगदड़ के समय उन्होंने कई लोगों को मरने से बचाया भी था। डॉक्टरों का कहना है कि पोस्टमार्टम नहीं करने का आदेश है, जो अपने आप में कई सवाल छोड़ जाता है। सरकार द्वारा अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बहुप्रचारित महाकुंभ में गंगा स्नान कर पाप धोने और सीधे बैकुंठ जाने का इतना अधिक प्रचार-प्रसार किया कि पाप धोने और मोक्ष पाने की कामना से श्रद्धालुओं की भीड़ लग गई। जिसमें सरकारी खुद को सर्वज्ञानी घोषित करने वाले धीरेंद्र शास्त्री जैसे मूर्ख लोगों द्वारा जो स्नान करने नहीं आएगा हिंदू वह देशद्रोही होगा। यानी अब वह कल का धूर्त लौंडा सर्टिफिकेट देगा कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही? सरकारी संरक्षण मिलने के कारण ही उसने ऐसी बदतमीजी की बात बोली थी, अन्यथा उसकी औकात कहां थी?
यहीं नहीं रुका वह। बेशर्मी की सीमा पार करते हुए भगदड़ में मरने वालों को मोक्ष पाने का दावा करने लगा, जिसका माकूल जवाब दिया शंकराचार्य ने और कहा, “उसे गंगा में मोक्ष चाहिए तो मैं धक्का देने को तैयार हूं। अहम बात यह है कि संगम नोज पर हुई भगदड़ में मरने की बात तो दूर, शासन प्रशासन भगदड़ को भी अफवाह बताने लगा। टुकड़े-टुकड़े में जो वीडियोस आने लगे हैं कि संगम नोज पर ही नहीं, झूंसी में भी भगदड़ मची, जहां जे.सी.बी. से मरने वाले श्रद्धालुओं को मिट्टी में दबा दिया, ताकि मरने के सबूत मिट जाएं, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों ने सच बता ही दिया। संगम नोज की भगदड़ में हुई मौतों का राज ऑन कैमरा एक बच्ची ने खोला। पत्रकार को मोर्चरी में जाने नहीं दिया गया। मृतक की शिनाख्त करने गए परिजन के अनुसार, लगभग डेढ़ सौ लाशें मेडिकल कॉलेज में रखी दिखीं। बोरे में भरी हुई भी। बिना पोस्टमार्टम के ही परिजनों को लाशें दी जा रही हैं। ऐसे तमाम परिजन ऑन कैमरा बोले। पुलिस उनसे लाश देने के पैसे मांगती है की भी असलियत सामने आई है। खबर तो यह भी आई कि तीन लाशें एंबुलेंस से कोलकाता भेज दी गईं बिना पोस्टमार्टम और डेथ सर्टिफिकेट के और कोलकाता से जवान तलब किया गया बताया जाता है। अस्पताल कर्मी पोस्टमार्टम नहीं किए जाने का कारण ऊपरी यानी सरकारी आदेश बताते हैं। यानी सरकार द्वारा प्रति मृत व्यक्ति के लिए पच्चीस लाख मुआवजा की घोषणा के कारण सरकार ने पोस्टमार्टम नहीं करने का निर्देश दिया है। योगी आदित्यनाथ संत संप्रदाय से आते हैं। दुर्घटना के बाद भी वे अफवाहों पर ध्यान नहीं देने का ट्वीट करते हैं। मरने की बात नहीं बताते। अब भगदड़ का कारण सपा को बताने की साजिश की जा रही है कि लाल टोपी वालों ने भगदड़ मचाई। वाह! अपनी नाकामी छुपाने के लिए दूसरों पर दोष मढ़ना बीजेपी की विशेषता है। इसे इसमें महारत हासिल है। देश की हर एक समस्या के लिए कांग्रेस और नेहरू परिवार को जिम्मेदार ठहराने की आदत सी पड़ गई है। तो यूपी सरकार निश्चित ही अपनी नाकामी छुपा रही है। जानबूझकर मरने वालों की वास्तविक संख्या कम बताने की कोशिश कर रही है। यहां तक कि पहले मृत लोगों की फोटो टांगी गई थी, जिन्हें हटा दिया गया है। सरकारी स्तर पर चालीस-पचास करोड़ श्रद्धालुओं के आने के दावे किए गए थे। हजारों सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और ड्रोन कैमरों से निगरानी की जा रही है। तो ड्रोन और सीसीटीवी के वास्तविक फुटेज क्यों नहीं जारी किए जाते, ताकि लापता होने वालों की पहचान उनके परिजन कर सकें। उन्हें ढूंढने का प्रयत्न कर सकें। सरकारी आदेश पर शवों का पोस्टमार्टम नहीं करने के कारण कोई परिजन मुआवजे की मांग नहीं कर सकेगा तो सरकार पैसे बचा लेगी। पैसे बचाने और प्रशासनिक फेल्योर से बदनाम होने के भय से ही पोस्टमार्टम नहीं किए जा रहे। पत्रकारों को मोर्चरी तक जाने से रोका जा रहा है, जिसका अर्थ है सरकार जानबूझकर तथ्य छुपा रही है। जिस पर शंकराचार्य ने योगी को आड़े हाथों लिया, जिन्हें योगी भक्तों ने कितना भला-बुरा कहा अशोभनीय है। ऐसे ही अंधभक्त बनाती रहती है बीजेपी। गालियां, मां-बहन की और दोगला, देशद्रोही आदि-आदि अलंकारों से किसी को भी अलंकृत कैसे किया जाए, यही तो बीजेपी की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग देती है। मृतकों की वास्तविक संख्या बाहर न आए, इसलिए पोस्टमार्टम नहीं करने का निर्देश सरकार ने जारी किया है, ताकि अव्यवस्था की पोल न खुले। लेकिन अव्यवस्था खुद श्रद्धालु हिंदुओं ने अपनी आंखों से देखा है। अपने ही लोगों को भीड़ द्वारा कुचले जाते देखा है। उनको वास्तविकता बताने से कैसे रोक सकेगी सरकार? तो अपनी अव्यवस्था की असफलता छुपाने के लिए सारा दोष सपाइयों पर मढ़ने में लगी है। सपा पर दोष मढ़कर अपनी नाकामी नहीं छुपा सकती सरकार। उन्हें क्या करेगी जिनके परिजन भगदड़ में मरे, उनके शव जे.सी.बी. से दफन कर दिए और बिना पोस्टमार्टम के ही शव सौंप दिए जा रहे? क्या वे चुप रहेंगे? उनका गांव, पूरा क्षेत्र एक दिन सच जानेगा। अव्यवस्था और झूठ का असर महाकुंभ मेले पर पड़ते देखा जा सकता है। अमावस्या की घटनाओं ने श्रद्धालुओं को दहलाकर रख दिया है। जो पुल श्रद्धालुओं से भरे रहते थे, अब सूने-सूने दिखने लगे हैं। इक्के-दुक्के लोग ही आ जा रहे हैं। राजनीति हमेशा से मौतों के आंकड़े कम करके बताती आ रही है, जैसा केवल तीस मौतों की बात पर अभी भी प्रशासन-शासन रुका हुआ है। वास्तविक मौतों का खुलासा शायद कभी नहीं करेगी सरकार। इसके लिए ड्रोन कैमरे हों या सीसीटीवी कैमरे, निश्चित ही भगदड़ और मौतों का सच दिखाने वाली क्लिपें उड़ा दी जाएंगी, ताकि कोई सबूत ही नहीं मिले। महाकुंभ खत्म होने से बहुत ही पहले नागाओं के गायब होने की सूचना से जाहिर है कि सरकारी प्रशासनिक असफलता और वी.आई.पी. लोगों के कारण ही श्रद्धालु मरे हैं। यद्यपि पहले भी दुर्घटना हुई है कुंभ में, लाखों लोग पहले भी रोज नहाते रहे हैं, लेकिन 1954 को छोड़कर इतनी अधिक मौतें कभी नहीं हुई। सही तस्वीरें सामने आने पर ही वास्तविकता देश के सामने आएगी।




