
सुप्रसिद्ध इंजीनियर, सोशल एक्टिविस्ट, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षक, सेना के लिए गर्म-गर्म तंबुओं के निर्माता, बर्फ पिघलने से बचाने का उपाय ढूंढने वाले, लद्दाख की स्वायत्तता के लिए सरकार को स्मरण दिलाने वाले सोनम वांगचुक, जिनकी मेधा पर थ्री इडियट्स फिल्म काफी पॉप्यूलर हुई थी, ठंड स्थान लद्दाख से गिरफ्तार कर उन पर एनएसए लगाकर गर्म राजस्थान की जेल में लगभग सात महीने रखना उन पर अन्याय करने जैसा था। लद्दाख पुलिस अधिकारी ने तब पहले कहा था, गृहमंत्रालय से आदेश आया था गिरफ्तार करने के लिए। सोनम वांगचुक लद्दाख को विशेष दर्जा दिलाने के लिए अनशन कर रहे थे। वांगचुक ने कभी देशद्रोही बातें या काम किया ही नहीं, लेकिन चीन द्वारा लद्दाख की जमीन पर कब्जा जमाने की बात अवश्य कही, जो तानाशाह शासन को सहन नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी बार-बार एक ही रट लगाते रहे हैं, न कोई घुसा है न घुसेगा। खुद चीन ने अरुणाचल प्रदेश को नक्शे में अपना दिखाया था। लद्दाख के चरवाहों ने कहा था, वे पहले जहां तक भेड़-बकरियां चराते थे, अब उन्हें रोका जाता है चीनी सेना द्वारा। सोनम वांगचुक चीन सीमा तक जनता को साथ ले जाकर प्रोटेस्ट करने वाले थे, जिसे प्रशासन ने रोक दिया, क्यों? यह प्रशासन ही बता सकता है। सोनम वांगचुक उस समय तक अनशन पर ही बैठे रहे थे, जब लद्दाख के लोगों ने रैली निकाली। अब भीड़ हिंसक क्यों हुई? कानून व्यवस्था का प्रश्न था। इसे प्रशासनिक स्तर पर ही सुलझाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं करके उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
सोनम वांगचुक की पत्नी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लेकर, क्योंकि कैद किए गए उनके पति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी थी और उन्हें मिलने तक नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट भी जैसे दबाव में था। तारीख पर तारीख मिलती रही। वरिष्ठ एडवोकेट कपिल सिब्बल ने पैरवी की और सोनम वांगचुक को कथित वीडियो, जिसमें लद्दाख के लोगों को हिंसक आंदोलन के लिए भड़काने का आरोप लगाया गया था, वांगचुक को नहीं दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट भी जैसे सोनम वांगचुक को अपराधी, देशद्रोही मान लिया था। अन्याय, वह पहले भी आदेश दे सकता था रिहाई के लिए। समूचे देश में इसका विरोध किया जा रहा था। सोशल मीडिया पर इंसाफ करने की बातें हो रही थीं। गिरफ्तारी और देशद्रोह के आरोप पर बहस शुरू हो गई थी। यहां तक कि जेल के बाहर कई संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग करने लगे थे। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का ही नहीं, जनता द्वारा सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन के दबाव में सरकार को झुकने के लिए बाध्य होना पड़ा। अंततः सरकार ने देशद्रोह की धारा एनएसए खत्म कर उन्हें जेल से रिहा कर दिया। न्याय मांगने वालों की यह जीत मानी जा रही है। कहा जा रहा, सत्य की जीत हुई। ईरान पर अमेरिकी और इजराइली हमले में छोटा सा स्वाभिमानी राष्ट्र ईरान ने दोनों को भारी क्षति पहुंचाई। इजराइल को खंडहर बना दिया। अमेरिकी एयरबेस, जो खाड़ी देशों में बनाए गए थे विश्व पर कब्जा करने के लिए, ईरान ने उन्हें ध्वस्त कर दिया। अमेरिका, जो शक्ति के घमंड में चूर था, बड़े नुकसान ने उसका घमंड चकनाचूर कर दिया। सच तो यह है कि अमेरिका और इजरायल ने सोचा था, ईरान के धार्मिक लीडर खामनेई की हत्या करने के बाद ईरान हथियार डाल देगा। दो दिनों में सरेंडर कर देगा ईरान, लेकिन ईरान ने कम कीमत के ड्रोन और मिसाइलों के हमले से अमेरिका-इजरायल की कमर ही तोड़कर रख दी। भारत की बीजेपी सरकार ने पूर्व की गुट निरपेक्षता की विदेशनीति पलट दी और अमेरिका-इजरायल की ओर झुकाव वाली विदेशनीति अपना ली। यह मात्र संयोग है या प्रयोग कि प्रधानमंत्री मोदी इजरायल जाकर वापस आते हैं, जिसके दूसरे दिन अमेरिका और इजरायल ईरान पर हमला कर देते हैं। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत ईरानी हमले की निंदा प्रस्ताव का समर्थन किया था। अमेरिका की टैरिफ धमकी के बाद भारत के सबसे घनिष्ठ मित्र और आपातकाल का साथी रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, लेकिन ईरान द्वारा जलडमरूमध्य से किसी भी मालवाहक जहाज के गुजरने पर रोक लगा दी, जिससे भारत तेल-गैस लेकर आ रहे तमाम कंटेनर शिप फंस गए। युद्ध के कारण कच्चे तेल का मूल्य बढ़ना स्वाभाविक ही है, क्योंकि सस्ते यातायात का मार्ग ही अवरुद्ध हो चुका था।
अमेरिका द्वारा भारत को तेल मंगाने की तीस दिनों की अनुमति ऐसे दी, जैसे भारत ट्रंप का गुलाम बना दिया गया हो। अब क्या कारण हैं जो भारत ट्रंप का जवाब ही नहीं दे पाता, जबकि ट्रंप बार-बार धमकी देता रहता है, बेइज्जती करता रहता है। अब अमेरिकी व्यापारी संघ जांच कर रहा, जिसमें भारत भी शामिल है। यह जांच तो एक बहाना है। दरअसल ट्रंप को टैरिफ बढ़ाना है। मालवाहक पोत के आवागमन बंद होने से भारत में पेट्रोल, रसोई गैस की आपूर्ति में कठिनाई आ गई है। इसीलिए रसोई गैस के मूल्य साठ रुपए बढ़ाए जा चुके हैं, जबकि लाखों टन पेट्रोल भारत पाइपलाइन द्वारा बांग्लादेश को भेज रहा है। भारत ने अभी तक ईरान के शिया धर्म गुरु अयातुल्लाह खोमैनी की हत्या पर एक भी शब्द नहीं बोला था। प्रधानमंत्री ने खुद फोन कर ईरानी राष्ट्रपति से बात करने पर मजबूर हो गए। विदेश मंत्री तो अब तक चार बार ईरानी विदेश मंत्री से फोन पर बात कर चुके हैं। भला ईरान क्या सोच रहा होगा, जो हमारा सामाजिक-आर्थिक पार्टनर रहा है। कोविड महामारी में लगभग आधे मूल्य पर तेल देता रहा है। हम उसके नेता की मृत्यु पर शोक संवेदना भी नहीं दे सके और जब तेल-गैस की समस्या हुई तो बात करने लगे। यहां गोदी मीडिया की बेजा हरकत भरी रिपोर्टिंग ने, जो ऑपरेशन सिंदूर के समय इस्लामाबाद और कराची पर कब्जा कर लिया था, आज हांकने में लगा है कि ईरान ने भारत के तेल ला रहे जहाज को आने दिया। कमाल का है हमारी मीडिया। ईरानी युद्ध पोत भारत आया था, भारत के साथ मित्रता पूर्ण युद्धाभ्यास किया, जिसमें राष्ट्रपति भी शामिल रहीं, लेकिन निहत्थे युद्धपोत को अमेरिकी पनडुब्बी से टॉरपीडो द्वारा डुबा दिया गया। श्रीलंका जैसे छोटे से देश ने अमेरिका-इजरायल की परवाह नहीं की और ईरानी नौसेना को बचाने के साथ पोत को अपने पोर्ट पर शरण और सुरक्षा भी दी। इन सबका असर ईरान पर क्या पड़ा होगा? अब जरूरत पड़ने पर भारत सरकार को ईरान याद आ रहा।




