
डॉनल्ड ट्रम्प दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही अनेकों घोषणाएं कर डाली। यह उनका तुगलकी फरमान अब अमेरिका में महंगाई उच्चतम स्तर पर आने के साथ भयानक मंदी की तरफ धकेलने वाला साबित होने जा रहा है। ग्रीन कार्ड होल्डर हों, चाहे बीजा एच-1, जिसके आधार पर विदेशी अमेरिका में उच्च शिक्षा ग्रहण करने आते हैं, ट्रंप द्वारा शिक्षा मद में भारी कटौती से अब उच्च शिक्षा के लिए निचले स्तर के शिक्षक क्लास लेने को मजबूर हो रहे हैं, जिसके कारण विज्ञान, इंजीनियरिंग, आईटी के लिए कुशल कर्मियों की कमी होगी, जिससे इन क्षेत्रों की कंपनियां बाहर का रुख कर सकती हैं। टैरिफ बढ़ाने से अमेरिका में आने वाली वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। यहां तक कि कम सैलरी देकर विदेशी एक्सपर्ट्स से काम चलाने वाली अमेरिकी कंपनियों को अमेरिकी मूल के लोगों को अधिक वेतन देने के कारण अमेरिकी प्रोडक्ट्स भी महंगे हो जाएंगे। फेडरल बैंक ब्याज दर में मात्र 0.5 प्रतिशत कटौती करने वाला है। अमेरिका में क्रेडिट कार्ड अधिक प्रचलित है, लेकिन खरीदी गई रकम बैंक को वापस नहीं आ रही, जिससे आम मध्यम अमेरिकी नागरिकों के द्वारा अब कम खरीदारी की जाएगी।
ट्रंप की ट्रेड वॉर का असर खुद अमेरिका में बहुत कम होगा। पिछली बार ट्रंप ने 65 अरब डॉलर माफ किए थे। आज 37 प्रतिशत क्रेडिट कार्ड होल्डर पैसे जमा नहीं कर पाए, जिससे उनसे ज्यादा वसूली बैंक करते दिखते हैं। ट्रेड वॉर से चीन के सस्ते सामान भी अब अमेरिका आने के कारण महंगे होंगे, जबकि अमेरिकी संस्थानों में लागत मूलतः बढ़ने के आसार साफ-साफ दिखने लगेंगे। अमेरिका में मंदी के आसार अभी से दिखने लगे हैं।
ट्रंप के निर्णय से अमेरिकी उच्च शिक्षा पर बुरा प्रभाव पड़ने वाला है, रिसर्च के कामों में बेहद कमी आएगी। टेक्नोलॉजी, भौतिकी आदि खोजों पर बुरा असर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ बढ़-चढ़कर बचाव के लिए संस्था बनाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने हाथ खींच लिए हैं, जिसका प्रभाव सबसे बुरा अमेरिका पर पड़ेगा। गंदे नाले बहते रहेंगे, पीने के लिए स्वच्छ जल का अभाव भी होगा।
नाटो से पीछे हटने का निर्णय अमेरिका को यूरोपीय संगठन से दूर ले जाएगा। यूक्रेन की सहायता से पीछे हटने, रूस के साथ मैत्री संबंध बनाने के कारण रूस-यूक्रेन युद्ध अस्थिर होगा। संभव है रूस, यूक्रेन सहित यूरोप के दूसरे अपेक्षाकृत कमजोर राष्ट्रों पर कब्जा कर ले। चीन की महत्वाकांक्षी योजना “ब्रिक्स इज डेड” मोदी के सामने कहकर ट्रंप ने धमकी दी थी, जिसका परिणाम हुआ कि भारत ने ब्रिक्स छोड़ दिया।
डॉलर के मुकाबले युवान चाहता था चीन, लेकिन परस्पर सहमति नहीं बनने से दूसरी मुद्रा भी तय नहीं हो सकी, जैसी सम्मिलित मुद्रा यूरोपीय राष्ट्रों ने यूरो लाकर आपसी व्यापार में अपनाई है। ट्रंप की दादागिरी के कारण भारत का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। छह लाख करोड़ रुपए का घाटा होगा। यही कारण है कि राजनीतिक सोच के कारण भारत आपदा को अवसर बनाने से चूक रहा है। शेयर मार्केट डूब चुका है, 96 लाख करोड़ डूब गया। लोग सोना खरीदने को मजबूर हुए, इसीलिए बाजार अस्थिर होने से सोने के मूल्य में भारी बढ़ोतरी हुई है। कहीं भारत में चौबीस कैरेट सोना एक लाख पार न हो जाए। ऐसा होने पर आम आदमी शादी-ब्याह में अब गहने बनवा नहीं पाएगा। अस्थिर बाजार का दुष्प्रभाव भारत पर पड़ने लगा है, लेकिन अंततोगत्वा अमेरिकी मंदी से अमेरिकी नागरिकों की हालत आज से अधिक खराब हो जाएगी। वस्तुएं महंगी होने और क्रय शक्ति कमजोर होने का खामियाजा अमेरिकी लोगों को भुगतना पड़ेगा। अब उच्च शिक्षा और अमेरिका में अच्छे जीवन की चाह में भारतीय अमेरिका जा नहीं पाएंगे। भारत सरकार ऐसा माहौल बनाए कि एफडीआई भारत की ओर आकर्षित हो।




