
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने ठाणे के येओर स्थित हज़रत पीर मामू भांजे दरगाह के खिलाफ वन विभाग द्वारा शुरू की गई बेदखली और तोड़-फोड़ की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि यदि अधिकारियों ने पहले न्यायालय को यह बताया था कि संबंधित आदेश के खिलाफ अपील का विकल्प उपलब्ध है, तो बाद में वे इससे विपरीत रुख नहीं अपना सकते। न्यायमूर्ति एन. जे. जमादार उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें असिस्टेंट कंज़र्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (नॉर्थ), येओर द्वारा 9 जुलाई 2026 को जारी अंतिम बेदखली नोटिस को चुनौती दी गई है। नोटिस में दरगाह ट्रस्ट को आठ दिनों के भीतर वन भूमि पर बने कथित अनधिकृत निर्माण को हटाने का निर्देश दिया गया था। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि निर्धारित समय में कार्रवाई नहीं होने पर वन विभाग स्वयं ढांचा हटाकर उसका खर्च ट्रस्ट से वसूल करेगा। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि नोटिस के आधार पर विभाग ने तोड़-फोड़ की कार्रवाई भी शुरू कर दी थी। उनका तर्क था कि यह कदम हाई कोर्ट के 2 जुलाई 2026 के आदेश के विपरीत है। उस आदेश में अदालत ने कहा था कि वर्ष 2023 में पारित आदेश के खिलाफ रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर के समक्ष अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है और इसी आधार पर पूर्व याचिका का निस्तारण किया गया था।हालांकि, नए बेदखली नोटिस में वन विभाग ने कहा कि 2023 के आदेश में अपील का उल्लेख अनजाने में किया गया था और वास्तव में ऐसा कोई वैधानिक अपीलीय प्रावधान उपलब्ध नहीं है। इस पर न्यायमूर्ति जमादार ने विभाग के विरोधाभासी रुख पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत इस बात से चिंतित है कि अधिकारियों ने पहले एक स्थिति प्रस्तुत कर न्यायालय से आदेश प्राप्त किया और बाद में उससे अलग रुख अपना लिया। अदालत ने कहा कि किसी पक्ष को इस प्रकार अनिश्चित स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि पहले ही यह स्पष्ट कर दिया जाता कि अपील का कोई वैकल्पिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है, तो न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने पर विचार कर सकता था। मामले में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए हाई कोर्ट ने 10 अगस्त 2026 तक किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही वन विभाग को 6 अगस्त 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अब मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त 2026 को होगी।

