HomeIndiaबालासाहब देवरस: समाज एवं देशसेवा को जीवन समर्पित

बालासाहब देवरस: समाज एवं देशसेवा को जीवन समर्पित

पत्रकार, लेखक व स्तंभकारहेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट, मध्यप्रदेश। बालासाहब देवरस का “बाला साहब” नाम उन्हें उनके परिवार और करीबी लोगों द्वारा प्यार से दिया गया एक उपनाम था, जो उनके वास्तविक नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस के साथ जुड़ या। बाला साहब एक लोकप्रिय मराठी शब्द है जिसका उपयोग छोटे लड़कों या प्रियजनों के लिए किया जाता है। यह उनके मिलनसार और स्नेही स्वभाव को दर्शाता है। 11 दिसम्बर 1915 को नागपुर में जन्मे बाला साहब देवरस पार्वती बाई- कृष्णराव देवरस की आठवीं संतान थे। 1925 में बालसाहेब ने शाखा जाना प्रारम्भ कर दिया। स्थायी रूप से उनका परिवार मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के आमगांव के निकटवर्ती ग्राम कारंजा का था। अभीष्ट, बाला साहब की स्मृतियां, सेवा और आयाम से प्रतिबद्ध पावन भूमि में बाल-भाऊ देवरस न्यास संचालित है। न्यास आर्थिक विकास, खेती प्रचार व प्रशिक्षण, महिला बचत गट प्रशिक्षण केंद्र, फलोद्यान प्रशिक्षण कार्यक्रम, दुग्ध व्यवसाय प्रशिक्षण कार्यक्रम, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में अरोग्य चिकित्सा शिविरों का आयोजन जनकल्याण के निहितार्थ करता है।
अनुपम सरस्वती शिशु मंदिर
दौरान, उनकी सम्पूर्ण शिक्षा नागपुर में ही हुई। न्यू इंगलिश स्कूल मे उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई। संस्कृत और दर्शनशास्त्र विषय लेकर मौरिस कालेज से बालसाहेब ने 1935 में बीए किया। दो वर्ष बाद उन्होंने विधि की परीक्षा उत्तीर्ण की। विधि स्नातक बनने के बाद बालसाहेब ने दो वर्ष तक अनाथ विद्यार्थी बस्ती गृह मे अध्यापन कार्य किया। इसके बाद उन्हें नागपुर मे नगर कार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। 1965 में उन्हें सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया जो 6 जून 1973 तक उनके पास रहा। श्री गुरूजी के स्वर्गवास के बाद 6 जून 1973 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सर संघचालक के दायित्व को ग्रहण किया। उनके कार्यकाल में संघ कार्य को नई दिशा मिली। उन्होंने सेवाकार्य पर बल दिया परिणाम स्वरूप उत्तर पूर्वाचल सहित देश के वनवासी क्षेत्रों के हजारों की संख्या में सेवाकार्य आरम्भ हुए। बालासाहब देवरस ने अपना जीवन समाज एवं देशसेवा को समर्पित कर दिया था। शिक्षा क्षेत्र में सबसे अग्रणी सरस्वती शिशु मंदिर योजना बालासाहब देवरस की ही अनुपम देन है।
प्रसिद्धि से दूरी की वृत्ति 
समर्पित, डाक्टर जी का स्वास्थ्य अधिक खराब होने के चलते बालासाहब को 1940 में कलकत्ता से वापस बुला लिया गया । देशभर के विभिन्न स्थानों पर प्रचारक भेजने की जिम्मेदारी नागपुर शाखा की ही सर्वाधिक रहती थी। स्वयंसेवक को उस हेतु गढ़ना, किसे कहाँ भेजना यह जिम्मेदारी बाला साहब उत्तम रीति से संभालते थे। डाक्टर जी के निर्देश पर 1937 से 1940 के बीच गुरूजी संघ कार्य में पूरी तरह डूब गए थे। शाखा पर होने वाले गणगीत, प्रश्नोत्तर आदि की उन्होंने ही शुरुआत की। संघ के कार्यक्रमों में मां भारती, डां हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के चित्र लगते हैं। बालासाहब के 1973 में संघ के तीसरे सर संघचालक बनने के बाद कुछ लोग उनका चित्र भी लगाने लगे पर उन्होंने इसे रोक दिया। यह उनकी प्रसिद्धि से दूर रहने की वृत्ति का ज्वलन्त उदाहरण है।
संघ कार्य में नये आयाम
साहसं, 1975 में संघ पर लगे प्रतिबन्ध का सामना उन्होंने धैर्य से किया। वे आपातकाल के पूरे समय पुणे की जेल में रहे; पर सत्याग्रह और फिर चुनाव के माध्यम से देश को इन्दिरा गांधी की तानाशाही से मुक्त कराने की इस चुनौती में संघ सफल हुआ। मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक उन्होंने यह दायित्व निभाया। इस दौरान उन्होंने संघ कार्य में अनेक नये आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्धन बस्तियों में चलने वाले सेवा के कार्य हैं। इससे वहाँ चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गई। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। स्वास्थ्य के कारण उन्होंने 1994 में सर संघचालक का दायित्व त्याग दिया था। अपूरणीय, बाला साहब देवरस का 17 जून 1996 को स्वर्गारोहण हुआ। प्रथम और द्वितीय सर संघचालकों का दाहसंस्कार स्वयंसेवकों ने नागपुर के रेशमबाग संघ कार्यालय में किया था। बालासाहब ने स्पष्ट कहा था कि उनका अंतिम संस्कार  सामान्य व्यक्ति की भांति श्मशान में किया जाए और उनकी समाधि न बनाई जाए। उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र शब्दांजलि! साभार जीवन प्रसंग!

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