
कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स
भारतीय लोकतंत्र के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट चुनावों का नहीं, संवाद का है। चुनाव समय पर हो रहे हैं, सरकारें बन रही हैं, संसद चल रही है और न्यायपालिका भी अपने दायित्व निभा रही है। फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों से उठती आवाज़ें एक असहज प्रश्न पूछ रही हैं कि क्या लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? क्या नागरिकों की असहमति अब लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखी जाने लगी है? और क्या सत्ता से प्रश्न पूछना धीरे-धीरे संदेह की निगाह से देखा जाने लगा है? ये प्रश्न किसी एक सरकार, किसी एक दल या किसी एक घटना तक सीमित नहीं हैं। ये भारतीय लोकतंत्र की उस बुनियादी संरचना से जुड़े प्रश्न हैं, जिसकी नींव संविधान ने स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रखी थी। लोकतंत्र केवल इस बात का नाम नहीं है कि जनता हर पाँच वर्ष में मतदान कर दे। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि सरकार बनने के बाद भी नागरिक की आवाज़ उतनी ही महत्वपूर्ण बनी रहे, जितनी मतदान के दिन थी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहमति नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक सुनने की क्षमता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तो वह सफल नहीं हो सकेगा। इस चेतावनी का आशय केवल संस्थाओं से नहीं था, बल्कि राजनीतिक संस्कृति से भी था। लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार कानून नहीं, बल्कि वह लोकतांत्रिक संस्कार है, जिसमें सत्ता आलोचना से घबराती नहीं और नागरिक प्रश्न पूछने से डरते नहीं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 ने नागरिकों को केवल बोलने का अधिकार नहीं दिया। उसने विचार व्यक्त करने, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने, संगठन बनाने और सरकार की नीतियों का विरोध करने का भी अधिकार दिया। यह संयोग नहीं था। संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन से सीखा था कि असहमति समाज को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे अधिक उत्तरदायी बनाती है। यदि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सत्याग्रह वैध था, तो लोकतांत्रिक भारत में शांतिपूर्ण विरोध भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या आज असहमति को उसी सहजता से स्वीकार किया जा रहा है, जैसी एक लोकतांत्रिक समाज से अपेक्षा की जाती है? पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में उभरे आंदोलनों को देखें तो उनके मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी शिकायत लगभग एक जैसी है कि हमें सुना नहीं जा रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर लद्दाख और हिमालय के पर्यावरणीय भविष्य को लेकर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का सत्याग्रह हो, मध्य प्रदेश में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित आदिवासियों का आंदोलन हो, झारखंड के बड़कागांव, कोयलकारो, नेतरहाट फायरिंग रेंज और गोड्डा में भूमि, जंगल और आजीविका को लेकर दशकों से चल रहे संघर्ष हों, या किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और भूमि अधिग्रहण को लेकर बार-बार उठता असंतोष,इन सबमें एक साझा तत्व दिखाई देता है। लोग केवल अपनी माँग नहीं रख रहे, वे संवाद की माँग कर रहे हैं। समस्या यह नहीं कि हर आंदोलन सही है या हर सरकारी परियोजना गलत। लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक भी नहीं है। सरकार के पास विकास की अपनी दृष्टि होती है और आंदोलनों के पास अपने अनुभवों से निकला प्रतिरोध। लेकिन लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती है कि इन दोनों के बीच संवाद कैसे स्थापित होता है। यदि संवाद की जगह संदेह ले ले, यदि बातचीत की जगह पुलिस पहुँच जाए और यदि प्रश्न पूछने वालों को पहले अपराधी की तरह देखा जाए, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होने लगती है। विकास और लोकतंत्र को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह एक खतरनाक सरलीकरण है। भारत को सड़कें चाहिए, उद्योग चाहिए, बिजली चाहिए, सिंचाई परियोजनाएँ चाहिए और रोजगार भी चाहिए। लेकिन विकास का अर्थ केवल परियोजनाओं का निर्माण नहीं है। विकास का अर्थ यह भी है कि जिन लोगों के जीवन पर इन परियोजनाओं का सीधा प्रभाव पड़ने वाला है, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक स्थान मिले। यदि विकास की कीमत नागरिक की आवाज़ हो, तो वह विकास अंततः समाज में अविश्वास पैदा करता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी देन केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं थी, बल्कि संवाद और प्रतिरोध की एक नैतिक परंपरा भी थी। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को इसलिए चुना क्योंकि वे मानते थे कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का सबसे प्रभावी माध्यम नैतिक शक्ति है। उन्होंने विरोध को हिंसा का पर्याय नहीं बनने दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा को सुनना भी है।
आज इस परंपरा को नए सिरे से याद करने की आवश्यकता है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी विफलता आंदोलन नहीं, बल्कि संवाद का समाप्त हो जाना है। जब जनता को लगता है कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तभी वह सड़क पर उतरती है। सड़क लोकतंत्र का पहला मंच नहीं, आख़िरी मंच होती है।
यही कारण है कि आज यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या हम संवाद आधारित लोकतंत्र से नियंत्रण आधारित लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर तलाशना है, तो केवल राजनीतिक घटनाओं को नहीं, बल्कि बदलती लोकतांत्रिक संस्कृति को भी समझना होगा।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि उसके पास कानून लागू करने की क्षमता है, बल्कि यह कि उसके पास असहमति को सुनने का धैर्य है। राज्य की शक्ति उसके पुलिस बल, प्रशासनिक तंत्र या दंड व्यवस्था से नहीं, बल्कि उस नैतिक वैधता से आती है जो जनता के विश्वास से निर्मित होती है। यही कारण है कि जब असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय कानून-व्यवस्था का प्रश्न बना दिया जाता है, तब संकट केवल आंदोलन का नहीं रहता, लोकतंत्र की विश्वसनीयता का भी हो जाता है।बीते कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन में एक नई राजनीतिक भाषा विकसित हुई है। असहमति रखने वालों को उनके तर्कों से नहीं, बल्कि विशेषणों से उत्तर दिया जाने लगा है। कोई “राष्ट्रविरोधी” है, कोई “विकास विरोधी”, कोई “अर्बन नक्सल”, कोई “देशद्रोही”। इस तरह के शब्द सार्वजनिक बहस को सरल अवश्य बना देते हैं, लेकिन लोकतंत्र को गहरा नहीं करते। किसी नागरिक के विचार से असहमति हो सकती है, लेकिन उसकी निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा देना लोकतांत्रिक विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता। वास्तव में लोकतंत्र में देशभक्ति का अर्थ सरकार से सहमत होना नहीं है। सरकारें बदलती रहती हैं, नीतियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी रहता है। इसलिए संविधान के प्रति निष्ठा और उसके मूल्यों की रक्षा ही लोकतांत्रिक देशभक्ति का सबसे प्रामाणिक रूप है। यदि कोई नागरिक संविधान के दायरे में रहकर सरकार से प्रश्न पूछता है, किसी नीति पर पुनर्विचार की मांग करता है या किसी विकास परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, तो वह राष्ट्र को कमजोर नहीं कर रहा होता बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत कर रहा होता है। चिंता का विषय यह भी है कि लोकतांत्रिक स्पेस केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं रह गया है। विश्वविद्यालयों में वैचारिक बहस का दायरा संकुचित होता दिखाई देता है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता और विपक्ष की शोरगुल वाली बहसों में उलझ जाता है, जबकि समाज के वास्तविक प्रश्न हाशिए पर चले जाते हैं। सोशल मीडिया ने विचार-विमर्श की जगह आरोप-प्रत्यारोप और ट्रोल संस्कृति को बढ़ावा दिया है। परिणाम यह है कि संवाद का स्थान ध्रुवीकरण लेता जा रहा है। लोकतंत्र में सबसे अधिक नुकसान तब होता है, जब समाज सुनने की क्षमता खो देता है।
महात्मा गांधी ने चेताया था कि अहिंसा कायर का नहीं, निर्भीक व्यक्ति का अस्त्र है। हिंसा तत्काल क्रोध का विस्फोट हो सकती है, लेकिन वह समाज में स्थायी समाधान नहीं देती। सत्याग्रह का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी का विनाश नहीं, बल्कि उसके विवेक को जगाना होता है। आज जब विभिन्न जनसंघर्षों में अधीरता और सत्ता की ओर से कठोरता दोनों दिखाई देती हैं, तब गांधी की यह सीख पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठती है। लोकतंत्र में जीत किसी पक्ष की नहीं, संवाद की होनी चाहिए।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में संवैधानिक नैतिकता का जो विचार रखा था, वह आज विशेष रूप से याद करने योग्य है। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल कानून का पालन करना नहीं, बल्कि असहमति के अधिकार का सम्मान करना भी है। यदि सत्ता केवल बहुमत की शक्ति पर निर्भर रहने लगे और नागरिक भय के कारण प्रश्न पूछना छोड़ दें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता में बदल जाता है। चुनाव तब भी होते रहेंगे, लेकिन लोकतांत्रिक चेतना कमजोर पड़ जाएगी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी समाज में परिवर्तन केवल सत्ता की इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि नागरिक समाज की सक्रियता से आया है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चंपारण से दांडी तक और भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक, हर जनआंदोलन ने यह सिद्ध किया कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतंत्र की ऊर्जा है, उसका संकट नहीं। इन आंदोलनों ने सत्ता को पराजित नहीं किया,उसे आत्ममंथन के लिए विवश किया। आज आवश्यकता यह नहीं कि आंदोलन समाप्त कर दिए जाएँ, बल्कि यह है कि उन्हें संवाद का अवसर बनाया जाए। सरकार को यह समझना होगा कि विरोध लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, न कि शासन की विफलता का प्रमाण। उसी प्रकार आंदोलनों को भी अपनी नैतिक शक्ति अहिंसा, संयम और संवैधानिक मर्यादा से प्राप्त करनी होगी। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, घृणा फैलाना या हिंसा का सहारा लेना किसी भी जनसंघर्ष की वैधता को कमजोर करता है।
सबसे बड़ा प्रश्न अंततः नागरिक समाज के सामने है। क्या हम भय के कारण चुप रहेंगे, या संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का जिम्मेदारी से उपयोग करेंगे? लोकतंत्र केवल प्रतिनिधियों का दायित्व नहीं है,यह नागरिकों की भी सतत जिम्मेदारी है। यदि नागरिक बोलना छोड़ दें, तो लोकतंत्र सुनना भी छोड़ देता है। और जब लोकतंत्र सुनना छोड़ देता है, तब संस्थाएँ भी धीरे-धीरे अपने नैतिक आधार खोने लगती हैं। आज इसलिए आवश्यकता किसी नए टकराव की नहीं, बल्कि नए लोकतांत्रिक आत्मविश्वास की है। ऐसा आत्मविश्वास जो सरकार को आलोचना से भयभीत न होने दे और नागरिक को प्रश्न पूछने से न रोके। ऐसा लोकतांत्रिक वातावरण, जिसमें संसद में बहस हो, विश्वविद्यालयों में विचारों का आदान-प्रदान हो, मीडिया निर्भीक होकर प्रश्न पूछे और सड़क पर होने वाला आंदोलन शासन का शत्रु नहीं, समाज का संदेश माना जाए। समय सचमुच चुप रहने का नहीं है,लेकिन यह समय हिंसा का भी नहीं है। क्योंकि हिंसा दुर्बल का शस्त्र है, अहिंसा सबल का। निर्भय होकर विचार करना, शांतिपूर्वक असहमति व्यक्त करना और संविधान की मर्यादा में रहकर सत्ता से जवाब मांगना,यही लोकतांत्रिक नागरिक का धर्म है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, बहुलता और संवाद की परंपरा रही है। यदि इस परंपरा को जीवित रखना है, तो असहमति को संदेह नहीं, लोकतंत्र की स्वाभाविक धड़कन मानना होगा। इतिहास अंततः उन्हीं समाजों को याद रखता है जिन्होंने अपने असहमत नागरिकों को सुना, न कि उन्हें चुप कराया। इसलिए आज की सबसे बड़ी पुकार केवल एक नारा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संकल्प है,चुप्पी तोड़ो, हिंसा नहीं। यही गांधी की विरासत है, यही आंबेडकर की संवैधानिक चेतना है और यही भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की सबसे बड़ी आशा। लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है। जनादेश सत्ता देता है, लेकिन वैधता केवल निरंतर संवाद से मिलती है। इसलिए कोई भी सरकार कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो, वह नागरिकों के प्रश्नों से ऊपर नहीं हो सकती। लोकतंत्र में सत्ता अंतिम सत्य नहीं होती, अंतिम सत्य संविधान और जनता की संप्रभुता होती है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण पीढ़ियों तक समाज को प्रभावित करता है। आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि देश में आंदोलन क्यों हो रहे हैं। लोकतंत्र में आंदोलन होना अस्वाभाविक नहीं है। असली चुनौती यह है कि क्या आंदोलनों को संवाद का अवसर माना जा रहा है या केवल प्रशासनिक समस्या के रूप में देखा जा रहा है। यदि हर विरोध को सुरक्षा का प्रश्न और हर असहमति को राजनीतिक चुनौती मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी संवाद क्षमता खो देगा।
किसान आंदोलन से लेकर आदिवासी संघर्षों तक, भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक, शिक्षा और रोजगार से लेकर स्थानीय स्वशासन तक,देश के अलग-अलग हिस्सों में उठ रहे प्रश्न एक-दूसरे से भिन्न अवश्य हैं, लेकिन उनका मूल स्वर एक ही है। नागरिक निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी चाहते हैं। वे केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं बनना चाहते, बल्कि उन नीतियों के सहभागी बनना चाहते हैं जो उनके जीवन को प्रभावित करती हैं। यही सहभागी लोकतंत्र की आत्मा है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता रही है। यहाँ असंख्य भाषाएँ, संस्कृतियाँ, आस्थाएँ और जीवन-पद्धतियाँ हैं। ऐसे समाज में एकरूपता नहीं, बल्कि सहमति और असहमति के बीच संतुलन ही लोकतंत्र को जीवित रख सकता है। यदि हर भिन्न मत को राष्ट्रविरोध की दृष्टि से देखा जाएगा, तो विविधता धीरे-धीरे भय में बदल जाएगी। और भय से कभी सशक्त राष्ट्र नहीं बनते। इतिहास बताता है कि जो सत्ता अपने आलोचकों को सुनती है, वह अधिक स्थायी होती है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद अपनी शक्ति का आधार भय नहीं, नैतिक शासन को बनाया। महात्मा गांधी ने सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता को नैतिक बनाने के लिए संघर्ष किया। जयप्रकाश नारायण ने भी सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन की बात कही। इन सभी उदाहरणों का सार यही है कि लोकतंत्र संवाद से चलता है, दमन से नहीं। आज यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता कमजोर हुई है। राजनीतिक बहसों में विचारों की जगह आरोपों ने ले ली है। सोशल मीडिया ने असहमति को शत्रुता में बदलने की प्रवृत्ति को बढ़ाया है। मीडिया का एक हिस्सा भी कई बार संवाद का मंच बनने के बजाय टकराव का मंच बन जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। लोकतंत्र की ताकत शोर में नहीं, बल्कि तर्क में होती है।
न्यायपालिका, संसद, मीडिया, विश्वविद्यालय और नागरिक समाज ये सभी लोकतंत्र के स्तंभ हैं। यदि इनमें से कोई भी कमजोर पड़ता है, तो उसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे पर पड़ता है। इसलिए इन संस्थाओं की स्वतंत्रता केवल संस्थागत प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी है। एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है, जहाँ न्यायपालिका निष्पक्ष हो, संसद में गंभीर बहस हो, मीडिया निर्भीक हो और विश्वविद्यालय विचारों के खुले मंच बने रहें। नागरिक समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं, दायित्वों का भी नाम है। असहमति का अधिकार तभी सार्थक है, जब उसका प्रयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाए। यदि आंदोलन हिंसक हो जाएँ, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाएँ या समाज में वैमनस्य फैलाएँ, तो वे अपनी नैतिक शक्ति खो देते हैं। गांधी ने इसलिए सत्याग्रह को अनुशासन, संयम और आत्मबल से जोड़ा था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि सर्वोच्च साहस है। आज जब अनेक सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न हमारे सामने हैं, तब सबसे अधिक आवश्यकता नागरिक निर्भयता की है। निर्भयता का अर्थ केवल सत्ता से प्रश्न पूछना नहीं, बल्कि अपने भीतर के पूर्वाग्रहों से भी मुक्त होना है। लोकतंत्र में स्वतंत्र विचार ही स्वतंत्र समाज की नींव रखते हैं। जो समाज सोचने से डरता है, वह धीरे-धीरे बोलने से भी डरने लगता है। और जो समाज बोलना छोड़ देता है, उसका भविष्य दूसरों के निर्णयों पर निर्भर हो जाता है। इसीलिए यह समय चुप रहने का नहीं है। लेकिन यह समय हिंसा का भी नहीं है। हिंसा दुर्बल का शस्त्र है, अहिंसा सबल का। हिंसा तात्कालिक उत्तेजना पैदा करती है, जबकि अहिंसा दीर्घकालिक परिवर्तन की आधारशिला रखती है। लोकतंत्र की रक्षा पत्थरों से नहीं, विचारों से होती है; घृणा से नहीं, संवाद से होती है,भय से नहीं, निर्भय नागरिक चेतना से होती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें आलोचना को लोकतांत्रिक साझेदारी मानें, विपक्ष विरोध को जिम्मेदारी से निभाए, मीडिया जनसरोकारों को केंद्र में रखे और नागरिक संविधान पर अपना भरोसा बनाए रखें। क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता की व्यवस्था नहीं, बल्कि विश्वास की व्यवस्था भी है। यह विश्वास टूट गया, तो सबसे मजबूत संस्थाएँ भी खोखली हो जाएँगी। इसलिए आज की सबसे बड़ी पुकार केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नैतिक आवश्यकता है। निर्भय होकर सोचो, शांतिपूर्वक बोलो, संविधान की मर्यादा में रहकर असहमति व्यक्त करो और सत्ता से जवाब माँगो। यही एक जागरूक नागरिक का धर्म है, यही गांधी का सत्याग्रह है, यही आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता है और यही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की सबसे बड़ी आशा है।

