Saturday, May 9, 2026
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झुग्गी-मुक्त मुंबई का सपना अब भी दूर, बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को लगाई फटकार

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करे, जो ‘स्लम एरियाज़ (इम्प्रूवमेंट, क्लीयरेंस एंड रीडेवलपमेंट) एक्ट, 1971’ का परफॉर्मेंस ऑडिट करेगी। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “झुग्गी-मुक्त मुंबई” का सपना पाँच दशक बीतने के बाद भी हकीकत से काफी दूर है। कोर्ट ने समिति को 10 महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस अद्वैत सेठना की विशेष पीठ ने कहा कि मुंबई की आवास व्यवस्था और शहरी नियोजन को सुधारने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि झुग्गी पुनर्वास परियोजनाएँ “खुली जगहों की कीमत पर” नहीं होनी चाहिए और इसके लिए वैज्ञानिक तथा क्षेत्र-वार पुनर्विकास मॉडल अपनाने की जरूरत है। यह विशेष पीठ सुप्रीम कोर्ट के 30 जुलाई 2024 के निर्देश के बाद गठित की गई थी, जिसमें स्लम एक्ट के क्रियान्वयन पर चिंता जताते हुए हाई कोर्ट को परफॉर्मेंस ऑडिट करने को कहा गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि मुंबई का बड़ा हिस्सा अब भी झुग्गियों से घिरा हुआ है, जो शहर के शहरी नियोजन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने कहा कि समय के साथ कदमताल न करने वाला शहरी नियोजन हमेशा सवालों के घेरे में रहेगा। हाई कोर्ट ने झुग्गीवासियों को मान्यता देने के लिए तय कट-ऑफ तारीखों को आगे बढ़ाने पर पूरी तरह रोक लगाने की सिफारिश की और कहा कि अब इसमें कोई और विस्तार नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि शहरों में आने वाले लोगों को सार्वजनिक आवास योजनाओं या खुले बाजार के माध्यम से घर उपलब्ध कराया जाना चाहिए, न कि अवैध अतिक्रमण को मुफ्त पुनर्वास आवास देकर प्रोत्साहित किया जाए। अदालत ने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास स्थित झुग्गियों पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे घरेलू एवं विदेशी यात्रियों के सामने मुंबई की छवि “झुग्गियों वाले शहर” जैसी बनती है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और प्रतिबंधित क्षेत्रों के पास की झुग्गियों को तत्काल स्थानांतरित करने की आवश्यकता पर बल दिया। पुनर्वास इमारतों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए अदालत ने “वर्टिकल स्लम” बनने के खतरे को लेकर आगाह किया और झुग्गी परियोजनाओं में अनुभवहीन “बाय-नाइट डेवलपर्स” की भूमिका की आलोचना की। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने प्रसिद्ध फिल्म सीआईडी के चर्चित गीत की पंक्ति उद्धृत करते हुए कहा — “ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके जरा बचके, ये है बॉम्बे मेरी जान।”

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