व्यंग्य: भरोसे की कसौटी पर कचौड़ी समोसा

सुधाकर आशावादी
सारा खेल भरोसे का है। किसी का भरोसा जीतना आसान नहीं है। कचौड़ियों ने भरोसा जीत रखा है। अनेक शहरों में कचौड़ियों का बड़ा व्यवसाय है। सुबह के नाश्ते में कचौड़ियों का साथ जलेबी भी खूब निभाती है। नमकीन के बाद में मीठे का आनंद ही कुछ अलग है। जलेबी का स्वाद ही ये जीभ मांगे मोर जैसी स्थिति उत्पन्न कर देता है। अपने यहां बेरोजगारी कम नहीं है। बेरोजगारी के चलते पढ़ाई में मन नहीं लगता। पढ़ने लिखने के बाद भी रोजगार के समुचित अवसर न मिलें,तो पढ़ने से क्या लाभ। इसीलिए जिनके हाथों में कापी किताबें होनी चाहिए थी, वे रील बनाने में अपनी सृजन क्षमता का उपयोग कर रहे हैं। न मिलने से कुछ तो अच्छा है। ऐसे में समोसा कुछ युवतियों के निशाने पर है। एक ही प्रकार की रील बनाने से ऊब उत्पन्न होती है, सो विषयवस्तु में परिवर्तन करना समय की मांग होती है। बहरहाल किशोरी हो या यौवना, किशोर हो या युवक,उसकी आँखों में सपने बड़े होते हैं। यदि समय से विवाह न हो या भरोसे वाला जीवन साथी न मिले, तब खीज होना स्वाभाविक है। यही खीज नकारात्मकता को जन्म देती है। मित्रों को बार बार भरोसे की कसौटी पर तोलने के लिए विवश करती है। भरोसे के प्रति संदेह व्यक्त करती है। भरोसा टूटने की आशंका में दो कचौड़ी एक समोसा, किसी का नहीं है कोई भरोसा, जैसा विमर्श गढ़ने का आधार बनती है। वैसे तो दो कचौड़ियों के साथ एक समोसे का कोई मेल नहीं होता, फिर भी तुकबंदी के लिए शब्दों का मनमाना प्रयोग किया ही जा सकता है, भले ही उनमें कोई मेल हो या न हो। वाक्य विन्यास का फार्मूला इस पर लागू नहीं होता। कचौड़ी के साथ जलेबी का मेल व्यावहारिक है। नमकीन के बाद मीठे की चाहत होती ही है। पारंपरिक उत्सवों में इसका ध्यान रखा जाता है। यदि कुछ खट्टा मीठा और नमकीन चटपटा हो, तो उसके बाद कुछ मीठा हो जाए की कामना होती ही है। फिलहाल समोसा नाश्ते के रूप में स्वादिष्ट व्यंजन है, किन्तु इसका प्रयोग ग्राहक के स्वाद पर टिका है। खट्टी मीठी चटनी के साथ समोसा, या आलू छोले की सब्जी के साथ समोसा अलग स्वाद का आनंद देता है, दो ब्रेड पीस के बीच दबा कर बड़ा पाव की तर्ज पर समोसा खाना कभी कभी लंच या डिनर जैसी संतुष्टि प्रदान कर सकता है। सवाल समोसे पर भरोसे का है। अब समोसे के भरोसे पर ही सवाल उठ रहे हैं। जिन्हें समोसे पर भरोसा है, वे समोसे के समर्थन में हैं। वे कहते हैं बिना समोसे के भी भरोसा करके नीले ड्रम का शिकार हो सकते हैं। ज़िन्दगी में भरोसे की बड़ी अहमियत है, यदि सरकारी बस में यात्रा करते समय बस चालक पर ही भरोसा न करें, प्लेन में पायलेट पर भरोसा न करें, तब यात्रा के सकुशल पूर्ण होने तक आशंका बनी रह सकती है। सो मेरा मानना यही है, कि परिवार में,समाज में, सार्वजानिक जीवन में बिना भरोसे के आगे बढ़ना सरल नहीं है। इसलिए भरोसा किसी पर करो या न करो, किन्तु स्वादिष्ट समोसे को भरोसे की कसौटी पर ट्रोल करके बदनाम करने का कोई औचित्य नहीं है। विमर्श यही बनाया जाना चाहिए – रसगुल्ला, रसमलाई, बड़ा पाव या हो समोसा, इन पर सभी हम करें भरोसा।

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