
इंद्र यादव/कानपुर, उत्तर प्रदेश। कानपुर से सामने आई एक भयावह घटना ने मानवता, कानून और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ पारुल तोमर हैं, जिनके परिवार ने इलाज के नाम पर करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन उनकी हालत अब भी गंभीर बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर आयुष चौधरी, जो अपनी पढ़ाई की फीस भरने के लिए किडनी बेचने को मजबूर हो गया। समस्तीपुर, बिहार निवासी आयुष चौधरी देहरादून के एक कॉलेज में MBA फाइनल ईयर का छात्र है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने और बढ़ती शिक्षा लागत के चलते वह दलालों के जाल में फंस गया। ‘शिवम’ नाम के एक बिचौलिए ने उससे 9 लाख रुपये में किडनी बेचने का सौदा किया। इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू दलाल द्वारा किया गया ‘साइकोलॉजिकल ब्रेनवॉश’ है। जब आयुष को डर लगा, तो उसे यह कहकर समझाया गया कि अंगदान एक “महान सेवा” है और इसमें कोई खतरा नहीं है। धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों का सहारा लेकर उसे मानसिक रूप से तैयार किया गया। मामले में आहूजा हॉस्पिटल और मेड लाइफ हॉस्पिटल की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। नियमों के अनुसार, किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सख्त कानूनी प्रक्रिया और जिला स्तरीय अनुमति अनिवार्य होती है, लेकिन आरोप है कि इन अस्पतालों में बिना पूरी जांच के ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। जैसे ही पुलिस को भनक लगी, मरीजों को कथित तौर पर दूसरे छोटे अस्पताल—प्रिया हॉस्पिटल—में शिफ्ट कर दिया गया। इस कदम ने पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली पर और सवाल खड़े कर दिए हैं। पैसों के लेन-देन में भी बड़ा घोटाला सामने आया है। पारुल के परिवार से करीब 1 करोड़ रुपये लिए गए, जबकि आयुष को 9 लाख रुपये का वादा किया गया, लेकिन उसके खाते में सिर्फ 3.5 लाख रुपये ही डाले गए। बाकी रकम को लेकर विवाद बढ़ा, जिसके बाद आयुष ने खुद पुलिस को सूचना दी। वर्तमान में पारुल तोमर और आयुष चौधरी दोनों हैलट अस्पताल (एलएलआर अस्पताल) में भर्ती हैं और उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज के कई गहरे संकटों को उजागर करता है—महंगी शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य क्षेत्र में अनियमितता और नैतिक पतन। अब देखना यह है कि जांच के बाद क्या इस पूरे रैकेट के असली मास्टरमाइंड और इसमें शामिल डॉक्टर कानून के शिकंजे में आते हैं या नहीं।



