
बीजेपी की केंद्र सरकार सांसदों में वृद्धि की योजना को अमलीजामा पहनाने में लगी है। इसलिए सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई, लेकिन असंतोष और भेदभाव खुलकर सामने आए। उत्तर भारत के हिंदी भाषी प्रांतों की जनसंख्या दक्षिण भारत की आबादी से बहुत अधिक है। बीजेपी का गणित है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में कम से कम दो सौ सीटें बढ़ा दी जाएं, तो हिंदी भाषी राज्यों के सांसदों की संख्या बढ़ाने का लाभ उसे मिल जाएगा और केंद्र सहित हिंदी भाषी राज्यों में राज्य सरकार भी बीजेपी की ही बनती रहेगी। यानी कुल मिलाकर बीजेपी को ही फायदा होगा।दक्षिण भारत में बीजेपी केवल उड़ीसा की राज्य सरकार में है। शेष राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं। केंद्र में वोटिंग के समय हिंदी भाषी राज्यों के सांसदों का वर्चस्व होगा, लेकिन यह कदम कई तरह से घातक सिद्ध हो सकता है। निश्चित ही आबादी के आधार पर उत्तर भारत बेल्ट में सांसदों की संख्या दो तिहाई से अधिक हो जाएगी। ऐसी स्थिति में दक्षिण के राज्यों के सांसद महत्व खो देंगे, क्योंकि संख्याबल कम रहेगा। लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 (815 राज्यों + 35 केंद्र शासित प्रदेश) करने का प्रस्ताव, जो 2026 के परिसीमन के तहत लाया जा रहा है, भारत में एक प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय है। दूसरी बात, अभी 543 सांसद लोकसभा के और राज्यसभा के सांसदों के वेतन, भत्ते और मुफ्त सुविधाओं के कारण देश की जनता पर बोझ बने हुए हैं। जिनकी कई-कई पेंशन के अलावा लगभग छह लाख रुपये तक वीआईपी सुविधाओं के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च होती है। जितने राष्ट्रपति होंगे, उतने महल बनाकर उनकी मनपसंद जगह पर देने पड़ते हैं—यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर जनता के धन की यह बर्बादी क्यों? जितने सांसद हैं, उनकी सुरक्षा पर इतना व्यय क्यों किया जाए? राजनीति आज एक प्रकार का व्यापार बन गई है, जहां भ्रष्ट, बलात्कारी और आपराधिक छवि वाले लोग भी माननीय बनकर बैठ जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ये जनहित के बारे में कैसे सोच सकते हैं? सरकार चाहे सांसदों की संख्या एक हजार कर दे, लेकिन उन्हें वेतन, भत्ते और मुफ्त सुविधाएं क्यों दी जाएं? अगर यह नौकरी है, तो फिर शैक्षिक योग्यता और परीक्षा अनिवार्य क्यों न हो? चपरासी के लिए दसवीं पास होना जरूरी है, तो सांसद और विधायक अनपढ़ क्यों हो सकते हैं? शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस बनने के लिए परीक्षा देनी होती है, तो सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री के लिए क्यों नहीं? अगर राजनीति सेवा है, जैसा कि अक्सर कहा जाता है, तो फिर वेतन-भत्ते और मुफ्त सुविधाएं क्यों? 40 साल नौकरी करने वाले कर्मचारियों की पेंशन खत्म कर दी गई, तो पांच साल सांसद रहने पर कई-कई पेंशन क्यों दी जाए? अगर जनसेवा ही उद्देश्य है, तो केवल पारिवारिक गुजारा भत्ता ही पर्याप्त होना चाहिए—ऐसा तर्क दिया जा रहा है। अगर सांसदों के वेतन-भत्ते, मुफ्त यात्रा, फोन, फर्नीचर, और अन्य सुविधाओं पर रोक लगा दी जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तव में कितने लोग सेवा भाव से राजनीति में हैं। जनसेवक अपने आवास से संसद तक पैदल भी जा सकते हैं या साइकिल से भी—जैसा कि कुछ नेताओं ने उदाहरण प्रस्तुत किया है। फिर क्षेत्र में जाने के नाम पर भत्ते क्यों?सवाल यह भी उठता है कि जनसेवकों को इतनी सुरक्षा की आवश्यकता क्यों होती है? डर तो अपराधियों को होना चाहिए, न कि जनसेवकों को। यदि किसी जनसेवक को अपनी जान का डर है, तो क्या वह वास्तव में जनसेवा कर रहा है या केवल दिखावा? प्रस्ताव दिया जा रहा है कि सांसद और विधायक बनने के लिए एसक्यू (सामाजिक योग्यता) टेस्ट अनिवार्य किया जाए और केवल पारिवारिक गुजारा भत्ता दिया जाए। इससे केवल वही लोग राजनीति में रहेंगे, जो वास्तव में जनसेवा करना चाहते हैं, जबकि अन्य लोग राजनीति से दूर हो जाएंगे। यदि इस तरह का कानून बनाया जाए, तो राजनीति में ईमानदार और योग्य लोगों की भागीदारी बढ़ेगी और भ्रष्टाचार, अपराध तथा धन के लालच में आने वाले लोग स्वतः बाहर हो जाएंगे। यही एक स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।




