
देवेश प्रताप सिंह राठौर
झाँसी, उत्तर प्रदेश। बाल्मीकि समाज सेवा समिति, झांसी द्वारा आयोजित आठवें सामूहिक आदर्श विवाह सम्मेलन में सामाजिक समरसता, सादगी और संस्कारों का अनुपम संगम देखने को मिला, जहाँ 12 नव दंपतियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य सात फेरे लेकर अपने दांपत्य जीवन की नई यात्रा प्रारंभ की। दूल्हों की बारात नगर निगम से प्रारंभ होकर एलाइट चौराहा और जीवन शाह तिराहा होते हुए महाराजा गंगाधर राव कलामंच (मुक्ताकाशी मंच), किला रोड, झांसी पहुँची, जहाँ विवाह की सभी रस्में विधि-विधान से संपन्न हुईं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. संदीप सरावगी ने हरी झंडी दिखाकर समारोह का शुभारंभ किया तथा नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद प्रदान किया। समारोह में सदर विधायक रवि शर्मा एवं संतराम पेंटर की गरिमामयी उपस्थिति रही। अपने संबोधन में डॉ. संदीप सरावगी ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि दो आत्माओं, दो परिवारों और दो संस्कृतियों का पवित्र मिलन है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह एक संस्कार है, जो जीवन को मर्यादा, जिम्मेदारी और समर्पण का बोध कराता है। “आज जब समाज में आडंबर और अनावश्यक खर्च की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, ऐसे समय में सामूहिक विवाह सम्मेलन सादगी, समानता और सामाजिक सहयोग का प्रेरक संदेश देता है। यह आयोजन केवल 12 जोड़ों का विवाह नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता और संवेदनशीलता का प्रतीक है। उन्होंने नवदंपतियों को संबोधित करते हुए कहा कि दांपत्य जीवन की वास्तविक सुंदरता आपसी विश्वास, संवाद, त्याग और सम्मान में निहित होती है। “जीवन में सुख-दुख, उतार-चढ़ाव आते रहेंगे, किंतु यदि साथ में धैर्य और विश्वास हो तो हर चुनौती अवसर में परिवर्तित हो जाती है। आप दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर परिवार और समाज के लिए आदर्श स्थापित करें। उन्होंने आयोजन समिति की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में सकारात्मक परिवर्तन की आधारशिला रखते हैं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए संबल का कार्य करते हैं। “जब समाज स्वयं आगे बढ़कर अपने कंधों पर जिम्मेदारी उठाता है, तब वह केवल परंपरा का निर्वहन नहीं करता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नई दिशा और नई सोच भी प्रदान करता है। आयोजन के अंत में नव दंपतियों को आशीर्वाद एवं उपहार प्रदान किए गए और पूरा वातावरण उल्लास, संस्कार और सामाजिक सौहार्द की भावना से ओतप्रोत रहा।




