विजयादशमी: विजय के पर्व में विदाई की संवेदना

कुमार कृष्णन
भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे सुंदर रूप उसके त्योहारों में दिखाई देता है। एक ही पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताओं और लोक-परंपराओं के साथ मनाया जाता है। दशहरा इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। देश के अनेक हिस्सों में जहां यह पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है, वहीं बंगाल, ओडिशा और असम में दुर्गा पूजा की परंपरा इसके स्वरूप को एक अलग भावभूमि प्रदान करती है। यहां मां दुर्गा केवल महिषासुर का वध करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि ऐसी बेटी भी हैं जो अपने मायके आती है और कुछ दिनों के प्रवास के बाद ससुराल लौट जाती है। इसीलिए विजयादशमी का दिन यहां विजय के उल्लास के साथ विदाई की भावुकता भी लेकर आता है। बंगाल में दुर्गा पूजा वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है। शारदीय नवरात्र में षष्ठी से विजयादशमी तक पूजा-पंडालों, मंदिरों और घरों में उत्सव का वातावरण रहता है। विशाल प्रतिमाएं, आकर्षक सजावट, ढाक की गूंज, धुनुची नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम इसे जनजीवन का अभिन्न हिस्सा बना देते हैं। इन दिनों देवी दुर्गा की आराधना शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी ने महिषासुर का वध कर संसार को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। बंगाल की दुर्गा पूजा का दूसरा पक्ष इसे विशिष्ट भावनात्मक गहराई देता है। लोकमान्यता में मां दुर्गा को उमा के रूप में देखा जाता है, जो अपने पति शिव के निवास कैलाश से मायके आती हैं। उनके साथ गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती भी आते हैं। मायके आई बेटी के स्वागत की यह कल्पना दुर्गा पूजा को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहने देती, बल्कि उसे पारिवारिक आत्मीयता से जोड़ देती है। बंगाल के पारंपरिक आगमनी गीतों में बेटी के आगमन की खुशी और विदाई गीतों में बिछोह की वेदना सुनाई देती है। विजयादशमी पर इसी भावभूमि पर देवी की विदाई होती है। विवाहित महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे सिंदूर खेला कहा जाता है। इसके साथ मिठाइयां बांटी जाती हैं और शुभ विजय की मंगलकामनाएं दी जाती हैं। यह परंपरा देवी को बेटी और सुहागिन के रूप में देखने वाली लोकभावना से जुड़ी है। इसके बाद ढाक की थाप और जयकारों के बीच प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। श्रद्धालु अगले वर्ष फिर आने की कामना करते हैं। इस तरह बंगाल में विजयादशमी आनंद और विषाद, मिलन और बिछोह का अद्भुत संगम बन जाती है। ओडिशा में भी दुर्गा पूजा व्यापक रूप से प्रचलित है। कटक अपनी साज-सज्जा और चांदी की झांकियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां पूजा में स्थानीय कलात्मक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य की सांस्कृतिक विविधता को समझना जरूरी है कि यहां सभी परंपराएं एक जैसी नहीं हैं। बालासोर जैसे क्षेत्रों में रहने वाले बंगाली समुदायों के बीच विजयादशमी पर सिंदूर खेला, मिठाइयों का आदान-प्रदान और शुभ विजय की बधाइयां विशेष महत्व रखती हैं। देवी को मायके से ससुराल लौटने वाली बेटी की तरह विदा करने का भाव धार्मिक अनुष्ठान को आत्मीय पारिवारिक अनुभव में बदल देता है।
असम में दुर्गा पूजा की परंपरा बंगाल से सांस्कृतिक निकटता रखते हुए भी अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ विकसित हुई है। गुवाहाटी सहित विभिन्न नगरों में पंडाल सजाए जाते हैं और श्रद्धालु पूजा में भाग लेते हैं। असम की पहचान में शक्ति-उपासना का विशेष स्थान है। कामाख्या जैसी शक्तिपीठ परंपरा इस क्षेत्र की धार्मिक चेतना को ऐतिहासिक गहराई देती है, हालांकि शारदीय दुर्गा पूजा और कामाख्या की पूजा-पद्धति अलग-अलग परंपराएं हैं। असम के कुछ क्षेत्रों में बंगाली समुदायों द्वारा सिंदूर खेला और भावपूर्ण विदाई की परंपरा भी निभाई जाती है। बंगाल, ओडिशा और असम की इन परंपराओं में एक समान सूत्र है,श्रद्धा को मानवीय रिश्तों की आत्मीयता से जोड़ना। मां दुर्गा जहां दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली दिव्य शक्ति हैं, वहीं वह बेटी भी हैं जिनके आगमन से मायका आनंदित होता है और विदाई पर भावुक हो उठता है। यहां विजयादशमी का अर्थ केवल विजय का उत्सव नहीं, बल्कि विदाई की संवेदना, पुनर्मिलन की आशा और शुभता के स्वागत की आकांक्षा भी है। प्रतिमा जल में विलीन हो जाती है, पर उसके आगमन और विदाई से जुड़ी भावनाएं मन में बनी रहती हैं। अगले वर्ष फिर आने की प्रतीक्षा यह विश्वास जीवित रखती है कि कठिनाइयों के बावजूद आशा, शक्ति और सद्भाव की वापसी संभव है।

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