व्यंग्य: लंकापति दशानन की व्यथा

सुधाकर आशावादी
लंकापति विचारमग्न हैं, उस लम्हे को कोस रहे हैं जब उनसे एक स्त्री के अपहरण का अपराध हो गया था। मार्ग में पक्षीराज जटायु से भिड़ंत होने पर भी उनका विवेक जागृत नहीं हुआ था। सदियां बीत गईं, मगर अपराध का दंड अब तक भुगत रहे हैं। एक अपहरण की इतनी बड़ी सजा! वह सोच रहे हैं कि यदि किसी अपराधी को मौत की सजा दी जाती है, तो एक बार ही दी जाती है, वह भी क्रूरतापूर्ण कृत्य के लिए। इसके लिए कुछ आधार गिनाए जाते हैं, फिर सजा के विरुद्ध अपील होती है, अपील खारिज होने पर आरोपी को फांसी के फंदे पर लटकाया जाता है, तब सजा पूर्ण होती है। बहरहाल, एक समय था जब अपहरण का दोष सिद्ध होने पर महाबली रावण को मौत की सजा मिली। यह अलग बात है कि अपहरणकर्ता को अपने बचाव का पूरा अवसर प्रदान किया गया। लड़ाई को सुर और असुर के मध्य युद्ध की संज्ञा दी गई। रावण का वध करने वाले की विजय को सत्य की विजय और असत्य की हार निरूपित किया गया। अपहरण और युद्ध के बीच का अंतराल भी लंबा था। अपहरण किस तिथि को किया गया, यह सुनिश्चित नहीं हो सका। फिर भी युद्ध का ऐलान हुआ। सेनाएं एक-दूसरे के सामने खड़ी हुईं, मारकाट मची। दोनों ओर से योद्धाओं ने अपने प्राण गंवाए। युद्ध की विभीषिका ऐसी ही होती है। बहरहाल, युद्ध एक बार हुआ, किंतु उसकी पुनरावृत्ति न जाने कब से हो रही है। गांव-गांव, शहर-शहर रामलीला का मंचन होता है। राम-रावण का युद्ध होता है, हर बार रावण की नाभि में तीर मारकर उसका वध किया जाता है। उसके बाद रावण का बड़े आकार का पुतला खड़ा करके दहन किया जाता है। रावण दहन की प्रक्रिया में भीड़ तालियां बजाती है, रावण का पुतला धू-धू कर जलता है। रामलीला समाप्त होती है और लोग अपने घरों को लौट जाते हैं। हर वर्ष यही होता है। प्रतिवर्ष दहन होने के कारण रावण को भी आदत पड़ चुकी है कि वह प्रतिवर्ष जले, अग्नि की भेंट चढ़े। लोग भी जानते हैं कि वे रावण दहन की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। उनके भीतर जो बुराइयों का रावण विराजमान है, उस रावण का वध करने की हिम्मत रावण-वध करने वालों में भी नहीं है। विजयदशमी के दिन प्रातः रावण महोदय मुझे हलवाई की दुकान पर मिल गए। नाश्ता करने आए थे। जलेबी-कचौड़ी का नाश्ता उन्हें प्रिय है, सो वे दोने में कचौड़ी और दम-आलू की सब्जी का स्वाद ले रहे थे।
मैंने कहा – कैसे हो?
वे बोले – ठीक हूं, अपने अमर होने का कष्ट भोग रहा हूं।
मैंने पूछा – आप तो युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो गए थे, फिर अमर कैसे हो गए?
वे बोले – भले ही राम के तीरों से छलनी होकर मेरी देह की मृत्यु हो गई हो, मगर मुझे किसी ने चैन से मरने भी नहीं दिया। संसार की दृष्टि में मैं जीवित हूं। यदि जीवित नहीं होता, तो विजयदशमी पर प्रतिवर्ष मेरा वध क्यों किया जाता?
रावण की तर्क-क्षमता का मैं कायल हो गया। यदि एक बार रावण की मृत्यु हो गई, तो बार-बार उसकी देह का दहन करने का औचित्य क्या है?
मैंने कहा- रावण जी, आप ठीक कहते हैं। आपने एक स्त्री का हरण ही तो किया था, वह भी अपनी बहन का अपमान किए जाने से क्रुद्ध होकर, उसकी सजा भी मिल गई, मगर सदियां बीतने के बाद भी हर बार आपका दहन किया जाता है। यह तो सरासर नाइंसाफी हुई।
रावण बोला – तुमने मेरा दर्द समझा, मेरे लिए यही बहुत है। आजकल भीड़तंत्र में कोई इंसाफ की बात ही नहीं करता। अपहरण की सजा कुछेक सालों की होती है। मैंने तो कोई दुराचार भी नहीं किया। जिसका अपहरण किया, उसे सुरक्षा के पहरे में रखा, फिर भी मुझे सजा ऐसी मिली कि लोग मेरी मृत्यु का भी उत्सव मनाते हैं।
मैंने कहा – रावण जी, संचार-क्रांति का युग है। आपको बुराई का प्रतीक मानकर आपका पुतला दहन किया जाता है।
रावण बोला – यदि मैं बुराई का प्रतीक हूं, तो पुरुषों को अपमानित करने वाली स्त्रियां, उन्हें नीले ड्रम की भेंट चढ़ाने वाली स्त्रियां, स्त्रियों को टुकड़ा-टुकड़ा करके फ्रिज में रखने वाले तत्वों को कौन सी श्रेणी में रखा जाएगा? मैंने चुप्पी साधने में ही भलाई समझी। रावण के तर्क का मेरे पास कोई तर्कपूर्ण उत्तर नहीं था।

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