
डॉ. सुधाकर आशावादी
किसी भी देश का सर्वांगीण विकास तभी संभव है, जब वहां के नागरिक देश, काल और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल कर देश के साथ खड़े हों। अपने स्वार्थों का त्याग करके सामूहिक रूप से समय समय पर होने वाली समस्याओं का समाधान खोजें तथा राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिक का कर्तव्य निभाएं। न कि अपनी स्वार्थपरता के चलते देश के सम्मुख स्वयं ही समस्या खड़ी करें। भारत में ऐसा ही है। देश के सम्मुख चाहे प्राकृतिक आपदा का संकट उत्पन्न हो अथवा किसी अंतरराष्ट्रीय समस्या के कारण किसी उपभोक्ता वस्तु की उपलब्धता पर संकट की संभावना हो, कतिपय अराजक शक्तियां भारत के सम्मुख अनेक आंतरिक समस्याएं उत्पन्न करने के लिए देश को अव्यवस्थित करने का षड्यंत्र रचने लगती हैं। कभी देश में नमक की उपलब्धता में कमी बताकर नमक की कालाबाजारी का मार्ग खोलती हैं, कभी घरेलू गैस संकट का ढोल पीटकर गैस की काला बाजारी को बढ़ावा देने लगती हैं। ऐसा अनेक अवसरों पर दृष्टिगत हुआ है, कि अफवाहों का बाजार गर्म करके समय समय पर देश की व्यवस्था को पंगु बनाने में अराजक शक्तियों ने अग्रणी भूमिका निभाई हो। विडंबना है कि कुछ राजनीतिक दलों की मंशा तो यही रहती है, कि येन केन प्रकारेण व्यवस्था को बदनाम करके सत्ता के विरुद्ध आक्रोश का माहौल बनाया जाए। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष में मतभेद होना नई बात नहीं है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सत्ता की निरंकुश नीतियों पर विरोध किया जाना अनिवार्य होता है, लेकिन जब राष्ट्र का प्रश्न हो, तो राष्ट्र को सर्वोपरि मानना प्रत्येक नागरिक का प्रथम दायित्व होना ही चाहिए। कोई भी राष्ट्र नागरिकों के प्रति सर्वकल्याण की भावना से ही गतिशील रहता है। व्यक्तिगत स्वार्थ राष्ट्र के सम्मुख कोई मायने नहीं रखते। ऐसे में अफवाहें फैलाकर मुनाफाखोरों को प्रोत्साहन देने तथा देश को अव्यवस्थित करने के प्रयास को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यूँ तो देश में सामाजिक समरसता के विरुद्ध न जाने कितने ही अभियान सोशल मीडिया एवं जमीनी स्तर पर चलाए जा रहे हैं, जिनसे निपटने में ही शासन प्रशासन का समय व श्रम बर्बाद हो रहा है, तिस पर राष्ट्र विरोधी शक्तियों के नकारात्मक विमर्श से राष्ट्र की व्यवस्था में अवरोध उत्पन्न करने जैसे कृत्यों को देश किस आधार स्वीकार करे, यह चिंतनीय है।




