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आदिवासी उत्पादों को मिले स्थायी बाजार, हर आदिवासी गांव बने आत्मनिर्भर: राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा

क्लस्टर विकास योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर, योजनाओं की सफलता लोगों की आय और जीवन स्तर से आंकी जाए

मुंबई। महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने कहा है कि आदिवासी क्षेत्रों में तैयार होने वाले उत्पाद उच्च गुणवत्ता के होते हैं, लेकिन उनके प्रभावी और स्थायी विपणन की सबसे अधिक आवश्यकता है। उन्होंने अधिकारियों से आह्वान किया कि क्लस्टर विकास योजना का प्रभावी क्रियान्वयन कर प्रत्येक आदिवासी गांव को आत्मनिर्भर और आदर्श गांव बनाया जाए तथा वहां रहने वाले परिवारों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर विकसित किए जाएं। शुक्रवार को राजभवन स्थित लोकभवन में अनुसूचित क्षेत्रों में समूह (क्लस्टर) विकास योजना की समीक्षा के लिए आदिवासी विकास विभाग के साथ आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में राज्यपाल ने यह निर्देश दिए। बैठक में राज्यपाल के सचिव डॉ. प्रशांत नारनवरे, आदिवासी विकास विभाग के सचिव विजय वाघमारे, आयुक्त लीना बनसोड, आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के आयुक्त निलेश सागर सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और परियोजना अधिकारी उपस्थित थे। राज्यपाल ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में बांस, बेंत, आयुर्वेदिक उत्पाद, लघु वन उपज सहित अनेक गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार किए जाते हैं, लेकिन इन उत्पादों की सबसे बड़ी चुनौती बाजार तक पहुंच है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गांव की उत्पादन क्षमता, उपलब्ध बाजार और उत्पादकों को मिलने वाली आय का अध्ययन कर दीर्घकालिक विपणन नीति तैयार की जानी चाहिए। इसके साथ ही उत्पादों की आकर्षक पैकेजिंग और उनके लिए स्थायी बाजार उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुंबई जैसे विशाल बाजार का लाभ आदिवासी उत्पादों को दिलाने के लिए प्रभावी विपणन रणनीति बनाई जानी चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ साझेदारी कर आदिवासी उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का प्रयास किया जाए। राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बाजार की मांग के अनुसार नए उत्पाद विकसित किए जाएं। साथ ही आदिवासी परिवारों को पशुपालन, डेयरी, कुक्कुट पालन और मत्स्य पालन जैसे विविध आजीविका आधारित व्यवसायों के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी योजना या परियोजना को शुरू करने से पहले संबंधित परिवार की आय का आकलन किया जाए और योजना लागू होने के बाद उसकी आय में कितना वास्तविक सुधार हुआ, इसका मूल्यांकन अनिवार्य रूप से किया जाए। योजनाओं की सफलता केवल उनकी संख्या से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव से मापी जानी चाहिए। राज्यपाल ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि केवल योजनाएं लागू करने तक सीमित न रहें, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि इन योजनाओं से आदिवासी परिवारों की आय, जीवन स्तर, स्वास्थ्य, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ है। इन सभी पहलुओं की नियमित समीक्षा कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए।
बैठक में आदिवासी विकास विभाग के सचिव विजय वाघमारे ने बताया कि विभाग ने विभिन्न सरकारी विभागों के समन्वय से विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। इसके लिए पशुसंवर्धन, डेयरी, मत्स्य पालन और कृषि विभाग सहित संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि केवल योजना बनाकर ही नहीं, बल्कि आवश्यक परियोजनाओं के लिए बजटीय प्रावधान भी सुनिश्चित किए गए हैं। वहीं, आदिवासी विकास आयुक्त लीना बनसोड ने आदर्श आदिवासी गांव क्लस्टर योजना के तहत चयनित क्लस्टरों, वहां संचालित की जाने वाली गतिविधियों और भविष्य की कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी प्रस्तुति के माध्यम से दी।

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