HomeIndiaआस्था की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन का समय

आस्था की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन का समय

भूपेन्द्र गुप्ता
भारत में मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, वे हमारी सांस्कृतिक परंपरा, सामाजिक जीवन और जनआस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इन मंदिरों के पास हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति, भूमि और दान की व्यवस्था होती है। ऐसे में यह प्रश्न समय-समय पर उठता रहा है कि इन संस्थाओं के वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन के लिए क्या एक समान राष्ट्रीय व्यवस्था होनी चाहिए? दक्षिण भारत में मंदिरों के प्रशासन के लिए बने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती कानूनों का उद्देश्य यही था कि मंदिरों की संपत्ति सुरक्षित रहे, आय का सही उपयोग हो और प्रबंधन में जवाबदेही बनी रहे। 1951 के मद्रास हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती कानून के बाद यह व्यवस्था विकसित हुई कि धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप किए बिना मंदिरों के प्रशासनिक और वित्तीय पक्ष को नियमन के दायरे में रखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी Shirur Mutt Case में स्पष्ट किया था कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन धार्मिक संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष प्रशासन जैसे संपत्ति प्रबंधन, लेखा और वित्तीय व्यवस्था को राज्य नियंत्रित कर सकता है। यही सिद्धांत आज भी महत्वपूर्ण है।
वर्तमान समय में देशभर के मंदिर अलग-अलग व्यवस्थाओं के अंतर्गत संचालित होते हैं। कहीं राज्य सरकारों के देवस्थान बोर्ड हैं, कहीं स्वतंत्र ट्रस्ट हैं और कहीं परंपरागत प्रबंधन व्यवस्था है। इस अलग-अलग व्यवस्था के कारण कई बार विवाद उत्पन्न होते हैं। मंदिरों की संपत्ति, दान की पारदर्शिता, नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर प्रश्न उठते रहते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के सामने यह विचार रखा जा सकता है कि क्या एक ऐसा राष्ट्रीय कानून बनाया जाए जो सभी धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के बजाय केवल वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही के न्यूनतम मानक तय करे। इस प्रकार के कानून का उद्देश्य मंदिरों की धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं होना चाहिए। पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपराएँ और आध्यात्मिक निर्णय पूरी तरह संबंधित धार्मिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में रहने चाहिए। लेकिन दान का हिसाब, संपत्ति का रिकॉर्ड, वार्षिक ऑडिट, बड़े आर्थिक निर्णय और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिनमें पारदर्शिता सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। ऐसा कानून बनने से एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ हो सकता है। इससे न्यायपालिका पर पड़ने वाला अनावश्यक दबाव कम हो सकता है। आज अनेक मामलों में मंदिरों के प्रबंधन, संपत्ति और प्रशासन से जुड़े विवाद अदालतों तक पहुँचते हैं। यदि स्पष्ट नियम, स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था और पारदर्शी प्रक्रिया पहले से निर्धारित हो, तो न्यायालयों को बार-बार प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता कम होगी।
यहाँ यह भी आवश्यक है कि किसी भी नए कानून का स्वरूप संतुलित हो। यदि मंदिर प्रशासन के नाम पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण स्थापित किया गया तो यह धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों पर प्रश्न खड़े कर सकता है। इसलिए बेहतर रास्ता प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं, बल्कि स्वतंत्र नियामक व्यवस्था हो सकती है। एक राष्ट्रीय मॉडल में निम्न प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं- सभी बड़े धार्मिक संस्थानों के लिए वार्षिक ऑडिट अनिवार्य हो।
आय और व्यय का सार्वजनिक विवरण। संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड। दान प्रबंधन के लिए पारदर्शी प्रक्रिया। स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था।
प्रबंधन समितियों की स्पष्ट जवाबदेही। धार्मिक मामलों और प्रशासनिक मामलों के बीच स्पष्ट विभाजन।
ऐसा कानून केवल हिंदू मंदिरों तक सीमित हो या सभी धर्मों के बड़े धार्मिक संस्थानों के लिए समान सिद्धांत लागू करे,यह भी व्यापक संवैधानिक बहस का विषय हो सकता है। लोकतंत्र में किसी भी धार्मिक संस्था की स्वतंत्रता का सम्मान आवश्यक है, लेकिन जहाँ सार्वजनिक दान और बड़ी संपत्तियाँ जुड़ी हों, वहाँ जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।
राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के धार्मिक स्थल के संदर्भ में यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े संस्थान यदि पारदर्शिता और सुशासन का उदाहरण बनते हैं, तो इससे धार्मिक विश्वास और मजबूत होगा। समय की मांग यह नहीं है कि सरकारें मंदिर चलाएँ, बल्कि यह है कि धार्मिक संस्थाएँ भी आधुनिक प्रशासन, वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक विश्वास के मानकों पर खरी उतरें। आस्था और पारदर्शिता विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं। एक संतुलित राष्ट्रीय कानून इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है जो मंदिरों की गरिमा बनाए रखे, श्रद्धालुओं का विश्वास बढ़ाए और न्यायपालिका को अनावश्यक विवादों से मुक्त करे।

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