Tuesday, May 19, 2026
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आधुनिक युग की अनिवार्य आवश्यकता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुम्ब प्रबोधन

पवन वर्मा   ​
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के समय से ही व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया है। संघ का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले समाज की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस समाज की सबसे छोटी, सबसे संवेदनशील और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है परिवार। वर्तमान समय में संघ के पंच परिवर्तन आयामों में से एक, कुटुम्ब प्रबोधन (पारिवारिक जागरण), कोई सतही अभियान नहीं बल्कि आज के पथभ्रष्ट होते समाज को सही दिशा देने वाली एक अनिवार्य सामाजिक संजीवनी है।
​आज का युग सूचना क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), तीव्र शहरीकरण और अंधी आर्थिक दौड़ का युग है। हम एक ऐसे कालखंड में जी रहे हैं जहाँ मनुष्य के पास चाँद-तारे नापने की तकनीक है, लेकिन अपने ही घर में बैठे बच्चों या बुजुर्गों के मन को टटोलने का समय नहीं है। भौतिक समृद्धि के चरम पर पहुँचने के बावजूद आज का समाज अंदर से खोखला, अकेला और तनावग्रस्त महसूस कर रहा है। इसी वैश्विक और सामाजिक संकट के बीच संघ का कुटुम्ब प्रबोधन विचार एक सशक्त ढाल बनकर सामने आता है। यदि हम आज के समाज का सूक्ष्म निरीक्षण करें, तो समझ आता है कि हमारी पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण ने हमें व्यष्टि (व्यक्तिवादी) बना दिया है, जबकि भारतीय संस्कृति समष्टि (सामूहिक) जीवन पर बल देती है। आज न्यूक्लियर फैमिली या एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है, जिसने अनजाने में ही सही, हमारे बच्चों को उनके दादा-दादी, नाना-नानी के उस अनमोल सान्निध्य से वंचित कर दिया है जो कभी कथा-कहानियों में जीवन के सबसे बड़े मूल्य सिखा दिया करते थे। दूसरा सबसे बड़ा संकट डिजिटल इन्वेजन यानी स्क्रीन का अत्यधिक दखल है। आधुनिक घरों की बनावट ऐसी हो गई है जहाँ हर कमरे में एक टेलीविजन है और हर हाथ में एक स्मार्टफोन। एक ही छत के नीचे, एक ही सोफे पर बैठे चार लोग चार अलग-अलग वर्चुअल दुनिया में जी रहे होते हैं। संवाद शून्यता (कम्युनिकेशन गैप) इस कदर बढ़ चुकी है कि एक घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे के अवसाद, उसकी चिंताओं या उसकी खुशियों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। यही कारण है कि आज युवाओं में अवसाद, आत्महत्या की प्रवृत्ति, वैवाहिक बिखराव के मामले और नशाखोरी तेजी से बढ़ रही है। इन तमाम समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं परिवार के भीतर के प्रबोधन यानी आपसी जुड़ाव और संस्कारों के लोप होने में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह सुस्पष्ट वैचारिक मत है कि किसी भी देश का उत्थान या पतन वहाँ के नागरिकों के चरित्र पर निर्भर करता है। नागरिक का चरित्र-निर्माण किसी कारखाने या केवल विद्यालयों में नहीं हो सकता, उसकी पहली और वास्तविक पाठशाला परिवार ही होती है। बच्चा जो कुछ अपने घर में देखता है, वही उसके अवचेतन मन में बैठ जाता है और आगे चलकर वही उसके सामाजिक व्यवहार में प्रकट होता है।
यदि परिवार में बड़ों का आदर नहीं है, तो वह बच्चा समाज में जाकर गुरुओं या वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान कैसे करेगा? यदि परिवार में भोजन की बर्बादी को सहज माना जाता है, तो वह बच्चा नागरिक बनकर देश के संसाधनों के प्रति संवेदनशील कैसे होगा? संघ ने इसी बुनियादी सत्य को पहचाना और कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से सीधे समाज की इस सबसे छोटी इकाई को संस्कारित करने का बीड़ा उठाया। यह कार्य किसी राजनीतिक या कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि प्रेम, आत्मीयता और अनौपचारिक संवाद के जरिए संभव है।​संघ द्वारा प्रचारित कुटुम्ब प्रबोधन का प्रारूप अत्यंत व्यवहारिक है। इसे किसी कठिन कर्मकांड या भारी-भरकम दार्शनिक सिद्धांतों में नहीं बांधा गया है, बल्कि इसे दैनिक जीवन के सीधे-सरल सूत्रों में पिरोया गया है। यदि हम इस विचार के मुख्य आयामों को देखें, तो समझ आता है कि यह आज के युग की हर समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है-
मंगल संवाद और वैचारिक विमर्श
कुटुम्ब प्रबोधन का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है परिवार के सदस्यों के बीच नियमित और सकारात्मक बातचीत। संघ का आग्रह है कि सप्ताह में कम से कम एक दिन पूरा परिवार बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट (मोबाइल, टीवी) के साथ बैठे। इस बैठक में घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों के संघर्षों, कुल की मर्यादाओं और महापुरुषों की कहानियां सुनाएं। जब बच्चों को पता चलता है कि उनके दादा-परदादा ने किन विषम परिस्थितियों में धर्म और मर्यादा की रक्षा की थी, तो उनके भीतर एक आत्मगौरव जागता है। इसके साथ ही, इस संवाद में राष्ट्रभक्ति और अध्यात्म जैसे गंभीर विषयों पर भी चर्चा होनी चाहिए, ताकि बच्चों का बौद्धिक और वैचारिक विकास केवल सतही और व्यावसायिक न रहकर राष्ट्र-केंद्रित बने।
स्क्रीन टाइम पर अंकुश और फैमिली टाइम की वापसी
​आजकल घरों में डाइनिंग टेबल पर भी लोग मोबाइल चलाते हुए भोजन करते हैं। कुटुम्ब प्रबोधन इस बात पर बल देता है कि दिन में कम से कम एक समय का भोजन पूरा परिवार एक साथ बैठकर करे। भोजन के समय केवल सकारात्मक बातें हों, न कि दिनभर का तनाव या बच्चों की खिंचाई। यह छोटी सी आदत परिवार के भीतर सुरक्षा और अपनत्व की भावना को इतनी मजबूती देती है कि व्यक्ति बाहर की किसी भी विपरीत परिस्थिति से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है।
सादगीपूर्ण जीवन और उपभोक्तावाद पर प्रहार
आज का आधुनिक समाज दिखावे की बीमारी से ग्रस्त है। सोशल मीडिया पर खुद को अमीर या आधुनिक दिखाने की होड़ में लोग ऐसी चीजें खरीद रहे हैं जिनकी उन्हें जरूरत नहीं है। इसके कारण परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और मानसिक शांति छिन रही है। कुटुम्ब प्रबोधन का स्पष्ट संकल्प है कि “मैं दिखावे में खर्च बिल्कुल भी नहीं करूँगा।” यह विचार नई पीढ़ी को संयम, सादगी और संतोष का पाठ पढ़ाता है। सादगी से जीने वाला परिवार कभी भी अनैतिक रास्तों पर धन कमाने के लिए अग्रसर नहीं होता, जिससे एक स्वच्छ समाज का निर्माण होता है।
​स्वावलंबन और मर्यादा के संस्कार
अक्सर देखा जाता है कि संपन्न परिवारों में बच्चे अपने छोटे-मोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनमें एक प्रकार का अहंकार या आलस्य आ जाता है। कुटुम्ब प्रबोधन बच्चों को सिखाता है कि “मैं भोजन के बाद अपनी थाली स्वयं धुलूंगा।” अपनी थाली खुद धोना, अपना कमरा साफ रखना, अपने कपड़े व्यवस्थित करना ये कोई मामूली काम नहीं हैं। ये कार्य बच्चे के भीतर से अहंकार को नष्ट करते हैं और उसे श्रम की महत्ता सिखाते हैं। इसके साथ ही, सुबह उठकर प्रातः स्मरण मंत्र का पाठ करना और विद्यालय जाने से पहले घर के सभी बुजुर्गों के चरण स्पर्श करना, बच्चे को उसकी जड़ों और सनातन संस्कृति के अनुशासन से बांधकर रखता है।
सामाजिक समरसता और पड़ोसी धर्म का निर्वाह
आज के शहरी समाज में लोग फ्लैट संस्कृति में जी रहे हैं, जहाँ पड़ोस के घर में क्या हो रहा है, किसी को सरोकार नहीं होता। मनुष्य सामाजिक प्राणी से घटकर केवल एक आर्थिक प्राणी बनता जा रहा है। संघ का कुटुम्ब प्रबोधन परिवार की परिधि को केवल अपने सगे-संबंधियों तक सीमित नहीं रखता। इसका एक मुख्य सूत्र है कि महीने में कम से कम एक बार अपने पड़ोसियों के साथ मिलकर मंगल संवाद किया जाए या उनके साथ बैठकर सह-भोजन किया जाए। जब विभिन्न जातियों, प्रांतों या पृष्ठभूमि के परिवार एक साथ बैठते हैं, तो समाज में व्याप्त ऊंच-नीच, जाति-पाति के भेद स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। यही वास्तविक सामाजिक समरसता है, जिसकी आज देश को सबसे ज्यादा जरूरत है।
​सनातन मूल्यों की पुनर्स्थापना और वैश्विक कल्याण
​भारतीय संस्कृति का मूल आधार ही वसुधैव कुटुंबकम् (पूरी धरती ही मेरा परिवार है) रहा है। लेकिन इस वैश्विक परिवार की अवधारणा तक पहुँचने का मार्ग अपने स्वयं के परिवार से होकर गुजरता है। जो व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर सकता, अपने भाई-बहनों से प्रेम नहीं कर सकता, वह संपूर्ण मानवता या राष्ट्र से प्रेम करने का दावा कैसे कर सकता है? जैसा कि इस अभियान के साहित्य में भी बार-बार उल्लेख आता है  “वयम् राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” (हम राष्ट्र में सदैव जागृत रहें)। यह जागृति बंदूकों या नारों से नहीं आती, यह जागृति तब आती है जब देश का हर घर संस्कारों का केंद्र बन जाता है। कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से संघ हर घर को एक संस्कार केंद्र में बदलना चाहता है, जहाँ से निकलने वाला प्रत्येक युवा चरित्रवान, संवेदनशील, स्वावलम्बी और राष्ट्र के प्रति समर्पित हो।
​आज पश्चिमी देश, जिन्होंने कभी व्यक्तिवादी जीवनशैली और अत्यधिक स्वतंत्रता की वकालत की थी, वे भी अपनी बिखरती सामाजिक व्यवस्था, अकेलेपन की महामारी और बढ़ते अपराधों से त्रस्त होकर भारत की ‘संयुक्त परिवार प्रणाली’ की ओर हसरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। ऐसे समय में, यदि भारत को अपनी इस अनमोल विरासत को बचाना है, तो संघ के इस अभियान को हर घर तक पहुँचाना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुम्ब प्रबोधन कोई कर्मकांडीय या धार्मिक कट्टरता का विषय नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक जीवन-शैली है। यह आधुनिकता का विरोधी नहीं है, बल्कि यह विवेकहीन आधुनिकता पर सांस्कृतिक नियंत्रण है। हमें तकनीक का उपयोग करना है, उसका गुलाम नहीं बनना है। हमें धन कमाना है, लेकिन अपनी मर्यादाओं को खोकर नहीं। आज के इस संक्रमण काल में, जहाँ वैचारिक प्रदूषण और नैतिक पतन हमारे द्वारों पर दस्तक दे रहे हैं, वहाँ अपने परिवार को बचाए रखना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है। परिवार बचेगा, तो समाज बचेगा, समाज बचेगा, तो सनातन संस्कृति सुरक्षित रहेगी और जब संस्कृति सुरक्षित रहेगी, तभी यह राष्ट्र पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन हो सकेगा। इसलिए, कुटुम्ब प्रबोधन आज के युग की केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को बचाए रखने का एकमात्र मार्ग है।

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