मतदाता सूची से नाम हटने की पीड़ा और हाशिए पर खड़ा आम आदमी

महेन्द्र तिवारी
लोकतंत्र में मतदान केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिक की पहचान, सम्मान और भागीदारी का प्रतीक है। जब किसी व्यक्ति को पता चलता है कि मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया गया है, तो यह उसके लिए केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं होती, बल्कि अपने ही देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपेक्षित हो जाने की पीड़ा भी होती है। जिस नागरिक ने वर्षों तक मतदान करके लोकतंत्र को मजबूत किया, अचानक उसी को अपनी नागरिक भागीदारी साबित करने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो उसकी बेबसी समझी जा सकती है। हाल के दिनों में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की खबरों ने इस प्रश्न को गंभीर बना दिया है। समाचारों के अनुसार, अनेक लोगों को सूची से नाम हटने के बाद दोबारा पंजीकरण कराने और अपनी पात्रता साबित करने की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली में भी लाखों मतदाताओं के नामों के पुनः सत्यापन की प्रक्रिया शुरू होने की खबर सामने आई है। निर्वाचन संबंधी अभिलेखों को शुद्ध रखना आवश्यक है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी योग्य नागरिक का नाम गलती से हट जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस समस्या का सबसे अधिक प्रभाव समाज के कमजोर और वंचित वर्गों पर पड़ता है। दैनिक मजदूरी करने वाला व्यक्ति एक दिन काम छोड़कर सरकारी कार्यालय जाता है, तो उसके परिवार की आमदनी प्रभावित होती है। झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और अशिक्षित नागरिकों के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटाना तथा निर्धारित प्रक्रिया पूरी करना आसान नहीं होता। जिनके पास पर्याप्त समय, संसाधन और प्रशासनिक जानकारी है, वे अपनी समस्या के समाधान का रास्ता खोज लेते हैं, लेकिन हाशिए पर खड़ा व्यक्ति अक्सर व्यवस्था की जटिलताओं के सामने असहाय हो जाता है। सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब वर्षों से मतदान करते आ रहे किसी व्यक्ति को अचानक अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है। कहीं किसी जीवित व्यक्ति को मृत मान लिया जाता है, तो कहीं स्थान परिवर्तन या अभिलेखों की त्रुटि के कारण नाम सूची से गायब हो जाता है। निर्वाचन आयोग के अपने दिशा-निर्देश भी नाम हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया, आवश्यक सत्यापन और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने पर बल देते हैं। इसलिए प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जाँच और समयबद्ध समाधान आवश्यक है। यह भी ध्यान रखना होगा कि मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट सूचना, सरल आवेदन व्यवस्था और प्रभावी शिकायत निवारण से दोनों उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है। नागरिक को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि उसका नाम किस कारण हटाया गया और उसे पुनः शामिल कराने के लिए क्या करना होगा। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल मतदान के आँकड़ों में नहीं, बल्कि इस विश्वास में निहित है कि प्रत्येक पात्र नागरिक की आवाज का समान महत्व है। यदि कोई गरीब व्यक्ति अपनी पहचान और मताधिकार बचाने के लिए संघर्ष करता रह जाए, तो यह पूरी व्यवस्था के आत्ममंथन का विषय है। मतदाता सूची में नाम दर्ज रखना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि नागरिक के सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है। व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगी, जब किसी पात्र नागरिक को अपनी ही पहचान साबित करने के लिए दर-दर भटकना न पड़े और उसकी लोकतांत्रिक आवाज किसी त्रुटि के कारण खामोश न हो जाए।

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