
मुंबई। महाराष्ट्र में मैंग्रोव (कांदळवन) क्षेत्रों पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण और मलबा डालने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। वहीं मैंग्रोव संरक्षण में योगदान देने वाले नागरिकों और संस्थाओं को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार योजना शुरू करने पर भी विचार किया जा रहा है। वन मंत्री गणेश नाईक ने कहा कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वालों में कानून का डर पैदा हो, इसके लिए कठोर कार्रवाई और सजा जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण दिवस के अवसर पर मुंबई के वाई.बी.चव्हाण सेंटर में आयोजित ‘कांदळवन प्रतिष्ठान पुरस्कार वितरण समारोह–2026’ में वन मंत्री गणेश नाईक ने यह बात कही। कार्यक्रम में वन विभाग के अपर मुख्य सचिव मिलिंद म्हैसकर, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वनबल) एम. श्रीनिवास राव, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) श्रीनिवास रेड्डी, कांदळवन प्रतिष्ठान के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य वन संरक्षक एन. आर. प्रवीण सहित वन विभाग के अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
2005 से अब तक की सैटेलाइट और गूगल तस्वीरों से होगी अतिक्रमण की जांच
वन मंत्री गणेश नाईक ने कहा कि राज्य में मैंग्रोव का संरक्षण समय की आवश्यकता है। समुद्री तटों पर पाए जाने वाले पक्षियों, मछलियों, कछुओं और अन्य समुद्री जैव विविधता का संरक्षण भी वन विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। मुंबई के मैंग्रोव क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मलबा डालने और अवैध निर्माण की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने चेन्नई विश्वविद्यालय के सहयोग से वर्ष 2005 से अब तक की सैटेलाइट और गूगल तस्वीरों के आधार पर अतिक्रमण की जांच करने के निर्देश दिए। जांच से प्राप्त जानकारी संबंधित अधिकारियों को भेजकर प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के 300 करोड़ वृक्षारोपण के आह्वान के अनुरूप वन विभाग लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
महाराष्ट्र में 315 वर्ग किलोमीटर तक पहुंचा मैंग्रोव क्षेत्र
वन विभाग के अपर मुख्य सचिव मिलिंद म्हैसकर ने बताया कि महाराष्ट्र में मैंग्रोव क्षेत्र 222 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 315 वर्ग किलोमीटर यानी करीब 31,500 हेक्टेयर हो गया है। उन्होंने कहा कि देश के लगभग 95 प्रतिशत मैंग्रोव पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और अंडमान-निकोबार में पाए जाते हैं। मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई और वसई-विरार जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में मैंग्रोव मौजूद होने के कारण उनका संरक्षण बड़ी चुनौती है।मैंग्रोव कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका को भी मजबूती देते हैं। इसके संरक्षण में जनभागीदारी बढ़ाना आवश्यक है।
संरक्षण में उत्कृष्ट कार्य करने वालों का सम्मान
समारोह में वन मंत्री गणेश नाईक के हाथों ‘कांदळवन प्रतिष्ठान पुरस्कार–2026’ प्रदान किए गए। पुरस्कार के तहत प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न और नकद राशि प्रदान की गई। स्वयं सहायता समूह श्रेणी में जलकन्या कांदळवन निसर्ग पर्यटन समूह, सिंधुदुर्ग को प्रथम पुरस्कार के रूप में ₹1 लाख, नवलाई निसर्ग पर्यटन समूह, रत्नागिरी को द्वितीय पुरस्कार के रूप में ₹75 हजार और गोपालकृष्ण समूह, सिंधुदुर्ग को तृतीय पुरस्कार के रूप में ₹50 हजार प्रदान किए गए। विशेष उल्लेखनीय कार्य के लिए रत्नागिरी के कुसुमाकर बागकर और पालघर के रेमन डिसूजा को सम्मानित किया गया। परियोजना सहायक श्रेणी में रायगढ़ के प्रथमेश बारे को प्रथम, सिंधुदुर्ग के दिगंबर तोरसकर को द्वितीय और मयूर पानसरे को तृतीय पुरस्कार दिया गया। आजीविका विशेषज्ञ श्रेणी में अनिकेत तोडमुरकर का सम्मान किया गया। सर्वश्रेष्ठ कार्य करने वाले वन अधिकारी एवं कर्मचारी श्रेणी में दत्ता उताडे, परशुराम शिंदे और प्रशांत बहादुरे को पुरस्कार प्रदान किए गए। विशेष योगदान के लिए अंजनेयुलू, संकेत शिंदे और संतोषी कदम को सम्मानित किया गया। फोटोग्राफी प्रतियोगिता में दीपेश हडकर ने प्रथम, नितीन जैन ने द्वितीय और धनंजय ठाकूर ने तृतीय स्थान हासिल किया। कार्यक्रम में कुछ पुरस्कार विजेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। संचालन दीप्ती भागवत ने किया, जबकि कांदळवन प्रतिष्ठान की सहनिदेशक मधुमिता एस. ने आभार व्यक्त किया।

