
सुधाकर आशावादी
जंतर मंतर पर धरना नई बात नही है। गांधी जी भी यही सिखा कर गए थे। अहिंसा परमो धर्म: यदि कोई आपके साथ हिंसा करे, आपके एक गाल पर चांटा मारे, तो दूसरा चांटा खाने के लिए उसके सम्मुख दूसरा गाल प्रस्तुत कर दो। शब्द अलग हो सकते हैं, किंतु गांधी जी का मंतव्य अलग नहीं। लोकतंत्र में अक्सर ऐसा ही होता है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। समाज में आचरण अपनी सुविधानुसार करना है। जब मन करेगा राम नाम जपेंगे। मतलब निकल गया तो कौन राम किसके राम, अब राम जी को राम राम, विकलांगता को सलाम। वैसे आंदोलनों का अपना अलग ही मज़ा है। कोई जेब से पैसा फूंक कर आंदोलन करने जंतर मंतर पर नहीं जाता, वह किसी के बुलावे पर जाता है, यदि बुलावा न मिले, तो मुफ़्त का माल खाने के लिए जाता है। यदि बर्गर, पिज़्ज़ा और चटपटे व्यंजन मुफ़्त में मिले, तो कोई क्यों न ले। मुफ़्त का माल खाने वाले को इस बात से क्या मतलब है, कि खाना जोमैटो से आ रहा है या किसी और एजेंसी से। खाना किसके पैसे से आ रहा है, वह देश के दुश्मन खिला रहे हैं या देश भक्त, इससे उन्हें क्या ? उन्हें जिसका खाना है उसी के अनुसार हर नारा लगाना है। चाहे उससे आतंकियों का सम्मान करो, आतंकियों को बिरयानी खिलाओ की मांग करा लो या घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की मांग करा लो। उन्हें तो केवल नारे लगाने हैं। वो भी वे नारे, जो उसे स्वादिष्ट व्यंजन खिलाने में सहायक हों। उसे शर्म जैसे शब्द का अर्थ नहीं सुनना है। लज्जा से उसे कोई सरोकार नही है। उसकी नजर में उसकी अपनी ही इज्जत नही है, अपने माँ बाप की भी नही। माँ बाप उसे कब से निकम्मा, कामचोर, नकारा कहकर उससे किनारा कर चुके हैं। घर से परिवार से बेदखल आदमी आख़िर जाता तो कहाँ जाता। इससे तो अच्छा है कि जंतर मंतर पर जाए, कुछ नारे लगाए और खुद को क्रांतिकारी घोषित कर दे। पता नही, कि कब मुक़द्दर बदल जाए, आवारा घोषित हुआ बेवड़ा कब वज़ीर बन जाए। कुछ नारे ही तो लगाने हैं, मसलन हमें चाहिए आज़ादी। गाली देने की आज़ादी। गली गली के शोर है … वंशवादी परिवार पूरा चोर है। तिलक, तराज़ू और तलवार, करो न इनसे कभी भी प्यार। मिला नही पीने को पानी, नही सहेंगे अब मनमानी। आजादी की यही निशानी, खूब करो अपनी मनमानी। नहीं सहेंगे अत्याचार, बिना पढ़े डिग्री लो यार। बैसाखी से हमें है प्यार, करो नहीं उनका तिरस्कार। घुसपैठियों से है हमको प्यार, उन पर न हो अत्याचार। आतंकियों से हमें है प्यार देश करे उनका सत्कार। पत्थर नहीं कोई हथियार, समझो फूलों सा उपहार आदि आदि। इन नारों को सुनकर प्रश्न खड़ा हुआ, कि रंगे सियार कौन सी आज़ादी की बात कर रहे हैं। वह आजादी जो सन सैंतालीस में मिली थी, या जेनरेशन गैप का नाम लेकर कुछ क्रांतिकारी कॉकरोच दूसरी आजादी माँग रहे हैं और इनके आजादी के अभियान में वो लोग भी जुड़े हैं, जिन्हें येन केन प्रकारेण भ्रष्टाचार से अपना घर भरने की आज़ादी चाहिए। जिससे उन्हें बरसों से वंचित रखा गया है। बहरहाल समाज किसी अकेले से निर्मित नहीं होता तथा बिना किसी के सहारे के कोई जीवन में अपना अस्तित्व बचा भी नही सकता। ऐसे में आजादी के नारे किसी व्यक्ति विशेष से आज़ादी तो दिला सकते हैं, किंतु आज़ाद रहने का विकल्प नहीं बन सकते।

