HomeIndiaसाहित्य और राष्ट्र धर्म के शांत साधक प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध'

साहित्य और राष्ट्र धर्म के शांत साधक प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

विवेक रंजन श्रीवास्तव
कुछ व्यक्तित्व समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे समय का ही हिस्सा बन जाते हैं। उनका जीवन एक तिथि में सिमट सकता है, पर उनकी उपस्थिति नहीं। वे अपनी रचनाओं, अपने विचारों और अपने आदर्शों के रूप में पीढ़ियों तक संवाद करते रहते हैं। प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ऐसे ही साहित्य-मनीषी थे। वे जितना बोले, उससे कहीं अधिक लिखा और जितना लिखा, उससे कहीं अधिक जिया। 25 जुलाई केवल उनकी पुण्यतिथि नहीं है। यह उस साधना को प्रणाम करने का दिन है जिसने लगभग एक शताब्दी तक ज्ञान, संस्कार, साहित्य और मनुष्यता की लौ जलाए रखी। नियति ने उन्हें जन्मशती तक पहुँचने से कुछ ही महीने पहले अपने पास बुला लिया, किंतु शायद शताब्दी वर्षों से नहीं, कृतित्व से पूरी होती है। उस अर्थ में ‘विदग्ध’ जी अपनी जन्मशती स्वयं अपने साहित्य में जी रहे हैं। वे उन विरल साहित्यकारों में थे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बीच कोई दूरी नहीं थी। आज जब शब्दों की चमक अक्सर जीवन की सच्चाई पर भारी पड़ जाती है, तब उनका जीवन विश्वास जगाता है कि साहित्य पहले आचरण में जन्म लेता है, बाद में कागज़ पर उतरता है। सादा जीवन और उच्च विचार उनके लिए कोई उपदेश नहीं था वह उनकी सहज जीवन-शैली थी। सरल वेश, मितभाषी स्वभाव, अनुशासित दिनचर्या, निरंतर अध्ययन और निष्काम कर्म, यही उनकी पहचान थी। उन्होंने इतिहास को किताबों में नहीं, जीवन में पढ़ा था। स्वतंत्रता आंदोलन की आहट सुनी, औपनिवेशिक भारत की बेड़ियाँ देखीं, स्वतंत्र भारत का स्वप्न साकार होते देखा और विज्ञान तथा तकनीक से बदलती दुनिया का विस्मय भी जिया। घोड़े पर डाक लेकर आने वाले डाकिये से लेकर डिजिटल युग तक का यह परिवर्तन उनके अनुभव-संसार का हिस्सा था। इसलिए उनके साहित्य में अतीत की स्मृति है, वर्तमान की सजगता है और भविष्य के प्रति अटूट विश्वास भी। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए सहज अनुभव होता है कि वे केवल कविता नहीं लिखते थे, वे मनुष्य के भीतर सोई हुई चेतना को संबोधित करते थे। उनका राष्ट्रप्रेम किसी राजनीतिक आग्रह का परिणाम नहीं था, वह भारतीय संस्कृति की आत्मा से उपजा हुआ स्वाभाविक भाव था। उनका अध्यात्म संसार से विरक्ति नहीं, संसार के प्रति अधिक उत्तरदायी बनने की प्रेरणा था। उनकी प्रसिद्ध प्रार्थना “माँ वीणापाणि” इसका अप्रतिम उदाहरण है। उसमें वे अपने लिए वैभव, यश या सफलता नहीं माँगते। वे समस्त मानवता के लिए सद्बुद्धि, करुणा, शांति और लोकमंगल की कामना करते हैं। यह कविता वस्तुतः उनके समूचे जीवन-दर्शन का घोष है। वे मानते थे कि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि ज्ञान है और ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य विश्व-कल्याण। उनकी साहित्य-साधना का एक विशिष्ट और स्थायी आयाम उनका अनुवाद-कर्म है। वे कहा करते थे “अनुवाद का काम दो भाषाओं का सेतु होता है और अनुवादक इस सेतु का निर्माणकर्ता।” यह केवल कथन नहीं, उनकी आजीवन साधना का सार है।
उन्होंने भगवद्गीता, मेघदूतम् और रघुवंशम् जैसे संस्कृत के अमर ग्रंथों का केवल भाषांतरण नहीं किया, बल्कि उनके प्राणों को हिंदी में प्रतिष्ठित किया। वे शब्दानुवाद के पक्षधर नहीं थे। उनका विश्वास था कि अनुवाद तभी सार्थक होता है जब अनुवादक मूल रचनाकार की संवेदना में प्रवेश कर उसकी आत्मा को दूसरी भाषा में पुनर्जन्म दे। इसी कारण उनके अनुवादों को विद्वानों ने “परकाया प्रवेश” की संज्ञा दी। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन अनुवाद के युग में उनका यह विचार और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है कि शब्दों का स्थानांतरण तकनीक कर सकती है, पर भावों का संप्रेषण केवल संवेदनशील मनुष्य ही कर सकता है। भाषा का व्याकरण सीखा जा सकता है, पर भाषा की आत्मा साधना से ही प्राप्त होती है।
प्रो.’विदग्ध’ का साहित्य किसी एक विधा की सीमाओं में कैद नहीं है। कविता, निबंध, बाल साहित्य, शिक्षा, चिंतन, अनुवाद, संपादन हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी चालीस से अधिक पुस्तकें केवल विपुल लेखन का प्रमाण नहीं हैं, वे उस निरंतर स्वाध्याय, आत्मानुशासन और कर्मनिष्ठा की साक्षी हैं, जो आज दुर्लभ होती जा रही है। आश्चर्य यह है कि इतना व्यापक साहित्य होते हुए भी उस पर गंभीर अकादमिक विमर्श अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया। आज समय की माँग है कि विश्वविद्यालय और शोध संस्थान उनके साहित्य की ओर गंभीरता से देखें। ‘प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव के साहित्य में राष्ट्रप्रेम’, ‘उनकी कविताओं में छायावादी संवेदना’, ‘उनके रचनाकर्म के आध्यात्मिक आयाम’, ‘संस्कृत से हिंदी पद्यानुवाद की उनकी विशिष्ट पद्धति’, ‘उनके बाल साहित्य का मूल्यबोध’, ‘उनके शैक्षिक चिंतन का समकालीन परिप्रेक्ष्य’ जैसे अनेक शोध-विषय नई पीढ़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका साहित्य केवल पढ़े जाने के लिए नहीं, समझे और शोधे जाने के लिए भी लिखा गया है। उनका जीवन साहित्य से अलग नहीं था। शिक्षक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया, जीवन का अनुशासन भी सिखाया। समाजसेवी के रूप में उन्होंने बिना किसी प्रचार के सेवा की। राष्ट्रधर्मी नागरिक के रूप में संकट की प्रत्येक घड़ी में अपनी जिम्मेदारी निभाई। और साहित्यकार के रूप में उन्होंने कभी लोकप्रियता का नहीं, प्रामाणिकता का मार्ग चुना। वे मंचों की चकाचौंध से दूर रहे, पर साहित्य के आकाश में उनका प्रकाश निरंतर फैलता रहा। उन्होंने स्वयं को नहीं, अपने लेखन को आगे रखा। शायद यही कारण है कि उन्हें जानने वाला प्रत्येक व्यक्ति पहले उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ, फिर उनके साहित्य से। आज जब साहित्य का बड़ा हिस्सा त्वरित प्रसिद्धि और क्षणिक चर्चाओं के आकर्षण से घिरा दिखाई देता है, तब प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ का संपूर्ण जीवन हमें यह सिखाता है कि साहित्य पुरस्कारों से नहीं, तप से जन्म लेता है, प्रसिद्धि से नहीं, प्रतिबद्धता से जीवित रहता है। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है,यह उस परंपरा को नमन करना है जिसमें ज्ञान विनम्र होता है, साहित्य लोकमंगल के लिए होता है और शब्द मनुष्य को बेहतर बनाने का संकल्प लेते हैं। समय निरंतर आगे बढ़ेगा। नई पीढ़ियाँ आएँगी, नए विमर्श जन्म लेंगे, नई तकनीकें भाषा का स्वरूप बदल देंगी किंतु जब भी हिंदी साहित्य में उन मनीषियों की चर्चा होगी जिन्होंने बिना शोर किए, बिना किसी आत्मप्रचार के, अपने समूचे जीवन को शब्दों की तपश्चर्या में अर्पित कर दिया, तब प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ का नाम अत्यंत आदर और कृतज्ञता के साथ लिया जाएगा। वे आज हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं, पर उनका साहित्य आज भी एक सेतु है अतीत और भविष्य के बीच, संस्कृत और हिंदी के बीच, ज्ञान और संवेदना के बीच, मनुष्य और मनुष्यता के बीच। कुछ दीपक बुझकर भी प्रकाश देते रहते हैं। प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ऐसा ही एक दीप थे,और रहेंगे।

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