प्रश्नोपनिषद – 3

जिस देश की
सभी लिपियों
और लगभग
सभी भाषाओं का
पहला अक्षर

हो

प्रश्नवाचक
अक्षर ह
सारे प्रश्न

से ही सिरजते हैं
जिस देश का
साहित्य
संस्कृति
और उसकी
प्रज्ञा
प्रश्न से ही
विकसी हो
प्रश्न
जिस सभ्यता का
चरित्र रहा हो
प्रश्न
जहां
ज्ञान की
अनिवार्य शर्त
रही हो
जहां
धर्म प्रश्न हो
कर्म प्रश्न हो
मर्म प्रश्न हो
वहां
प्रश्न
शर्म कैसे हो सकता है

प्रश्न
अवज्ञा कैसे हो सकती है
प्रश्न
विरोध कैसे हो सकता है
पूरी दुनिया
जहां
आदेश
आकाशवाणी
या ऊपर से
थोपे गए जीवन को
सार्थक मानती थी
वहीं
सबसे पहले
ऋग्वेद की ऋचाओं में
प्रश्न से
शुरुआत होती है
वहां
कोई ईश्वर नहीं
कोई सर्वशक्तिमान
सत्ता नहीं
कोई इयत्ता नहीं
जो प्रश्न के दायरे से
बाहर हो
ज्ञान का महामार्ग
प्रश्न की पगडंडियों
से गुज़रे बगैर
संभव नहीं
उसी देश में
जवाबों के सौदागरों ने
सवालों का
क़त्लेआम किया
सभी ने
अपने अपने जवाब
ख़ूबसूरत लिबास में
बाज़ार में टांग दिए
सवाल

हमेशा
हुकूमत पर
भारी पड़ते हैं
हुकूमत ने
जवाबों को पनाह दी
सवालों को
गुनाह करार दिया
इस तरह
एक बढ़ते हुए
मुल्क को
मार दिया
जवाबों की किताबें
मरे हुए मुल्क की
ख़ूबसूरत कब्र पर
सजा दी गईं
इस तरह
सवालों को
सज़ा दी गई
सवालों का मरना
सभ्यता की मौत
संस्कृति की मौत
विज्ञान की मौत
इन्सानियत की
मौत होती है
अब
हमें तै करना है
कि हमें
एक ज़िंदा दुनिया में
रहना है
या
एक ख़ूबसूरत कब्रिस्तान में !
जवाब
बाद में दीजिएगा
पहले
ख़ुद से
सवाल कीजिए!
-हूबनाथ

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