
झांसी, उत्तर प्रदेश। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (BU), झांसी और देश की प्रतिष्ठित विरासत संरक्षण संस्था इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH), झांसी चैप्टर के बीच पुरातत्व, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण एवं प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के माध्यम से दोनों संस्थान संयुक्त रूप से अनुसंधान, शिक्षा, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के विभिन्न कार्यक्रम संचालित करेंगे। समझौता हस्ताक्षर समारोह में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय, कुलसचिव ज्ञानेंद्र कुमार, आईक्यूएसी (IQAC) के निदेशक प्रो. सुनील कुमार काबिया, प्रो. अवनीश कुमार, डॉ. ऋषि सक्सेना, डॉ. हितिका यादव, हेमंत चंद्रा तथा चंद्रभान प्रजापति उपस्थित रहे। वहीं, INTACH मुख्यालय की ओर से गवर्निंग काउंसिल सदस्य एवं चैप्टर्स डिवीजन एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन नीलकमल माहेश्वरी तथा INTACH झांसी चैप्टर के संयोजक राजेंद्र कुमार राय ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। एमओयू के तहत विश्वविद्यालय परिसर में ‘INTACH-BU सेंटर फॉर हेरिटेज मैनेजमेंट एंड कंजर्वेशन (CHMC)’ की स्थापना की जाएगी। इसके साथ ही विरासत संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी परीक्षणों को प्रोत्साहित करने के लिए एक अत्याधुनिक संरक्षण प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं परीक्षण प्रयोगशाला (Conservation Laboratory) भी स्थापित की जाएगी। इस सहयोग के अंतर्गत बुंदेलखंड क्षेत्र की उन ऐतिहासिक धरोहरों और स्मारकों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) अथवा राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण दायरे में नहीं हैं। दोनों संस्थाएं इन विरासत स्थलों के संरक्षण के साथ-साथ उनके प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए भी संयुक्त अभियान चलाएंगी। समझौते के तहत अल्पकालिक पाठ्यक्रम, व्याख्यान, कार्यशालाएं, सेमिनार, प्रदर्शनियां तथा विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त ऑडियो-विजुअल शिक्षण सामग्री तैयार करने और अकादमिक जर्नल प्रकाशित करने की भी योजना है, जिससे विरासत संरक्षण के क्षेत्र में शोध एवं अध्ययन को नई दिशा मिल सके। इस अवसर पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि बुंदेलखंड क्षेत्र ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। INTACH के साथ यह सहयोग न केवल शोधार्थियों और विद्यार्थियों को नई संभावनाएं उपलब्ध कराएगा, बल्कि स्थानीय समुदायों में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा क्षेत्र की मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।



