
सुभाष आनंद
हमारे देश की संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था मानसून पर निर्भर करती है। विश्व की सबसे प्रबल मानसून पवनें जून से आरंभ होकर सितंबर के अंत तक भारत में बरसती हैं। हिंद महासागर से उठने वाली हवाओं को ही मानसून का जन्मदाता माना जाता है। यद्यपि मानसून के बारे में वैज्ञानिक अभी तक इसका पूरा खुलासा नहीं कर पाए हैं, परंतु उपग्रहों, रॉकेटों और नए शोधों के माध्यम से जानकारी निरंतर बढ़ रही है।
मानसून की उत्पत्ति का विज्ञान
मानसून की उत्पत्ति का मुख्य कारण पृथ्वी के विभिन्न भागों द्वारा सूर्य से अलग-अलग मात्रा में ऊर्जा प्राप्त करना है। जल और थल पर सौर ऊर्जा का प्रभाव अलग-अलग पड़ता है।
मृदा की रासायनिक बनावट के कारण थल में ऊर्जा का संचालन धीमी गति से होता है। यह कुछ सेंटीमीटर मोटी परत को ही गर्म कर पाती है। इसलिए ऊर्जा का अधिकांश भाग थल की बजाय उसके ऊपर गुजरने वाली वायु को गर्म करता है। इसके विपरीत, सागर पर पड़ने वाली सौर ऊर्जा पानी में काफी गहराई तक प्रवेश कर जाती है। इस कारण सागर के ऊपर स्थित वायु को गर्म करने के लिए अपेक्षाकृत कम ऊर्जा बचती है। फलस्वरूप सागर के ऊपर की हवा कम गर्म हो पाती है।
मृदा, जल और वायु के तापमान में अंतर का एक अन्य महत्वपूर्ण घटक ‘ऊष्मा धारिता’ है। पानी की ऊष्मा-धारिता मृदा और वायु की तुलना में अधिक होती है। समान मात्रा में ऊष्मा देने पर भी पानी को निश्चित तापमान तक पहुँचने के लिए मृदा और वायु की अपेक्षा अधिक ऊष्मा की आवश्यकता पड़ती है। इसका अर्थ है कि सागर थल की अपेक्षा देर से गर्म होता है और ठंडा होने में भी अधिक समय लेता है। जब ये घटनाएँ छोटे स्तर पर होती हैं तो जल समीर और थल समीर पैदा होता है। यदि ये घटनाएँ बड़े पैमाने पर उत्पन्न हों, तभी मानसून पैदा होता है। मानसून हवाओं की उत्पत्ति एवं दिशा बदलने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके लिए सागर और थल के तापमानों में अंतर अधिक होना चाहिए।
ग्रीष्म और शीतकालीन मानसून
मानसून पवनें ग्रीष्म और शीत ऋतुओं दोनों में पैदा होती हैं, परंतु ग्रीष्म ऋतु में ये अधिक प्रभावशाली होती हैं। उत्तरी गोलार्ध में मई, जून, जुलाई और अगस्त महीनों में इसका प्रभाव सबसे अधिक रहता है। दक्षिण गोलार्ध से आने वाली हवाएँ यानी व्यापारिक पवनें उत्तरी गोलार्ध तक, दक्षिण-पूर्वी एशिया तक प्रवेश कर जाती हैं। इनकी एक कमजोर शाखा दक्षिण अफ्रीका की तरफ मुड़ जाती है और दूसरी शाखा का रुख बंगाल की खाड़ी की तरफ मुड़ जाता है। यही पवनें भारत के दक्षिणी भाग में वर्षा करती हैं। शीतकालीन मानसून को भारत में ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ के नाम से जाना जाता है। मोटे तौर पर कहा जाए तो पृथ्वी के वे भाग जहाँ ठंडे से गर्म क्षेत्र की तरफ बड़े स्तर पर वायु का प्रवाह होता है, मुख्य मानसून क्षेत्र माने जाते हैं। ऐसे क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप भी शामिल है, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी एवं पूर्वी अफ्रीका और पूर्वी एशियाई देशों में पाए जाते हैं।
भारत में मानसून का महत्व
विश्व की सबसे प्रबल मानसून पवनें हमारे देश में जून से आरंभ होकर सितंबर के अंत तक सक्रिय रहती हैं। इस प्रकार भारत में 100 से 125 दिनों तक अच्छी वर्षा होती है।
यह समझा जाता है कि गर्मी की शुरुआत में पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है, परंतु वास्तविक तथ्य ऐसा नहीं है। वास्तव में पृथ्वी गर्मी में शीत ऋतु की अपेक्षा सूर्य से औसतन 40 लाख किलोमीटर अधिक दूरी पर होती है। पृथ्वी की धुरी का झुकाव ही ऋतुओं का कारण है। उत्तरी गोलार्ध की ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी की उत्तरी धुरी सूर्य की तरफ झुकी रहती है। जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर में भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्र अधिक गर्म हो जाते हैं। इंडोनेशिया के पास सागरों का तापमान तेजी से बढ़ता है, जिससे यहाँ वायु का दबाव कम होने लगता है। जबकि तिब्बत के आसपास क्षेत्रों में वायु का दबाव बढ़ने लगता है। इसी दबाव के अंतर से मानसून का बहाव निर्धारित होता है। ठंडी मानसून की हवाओं में भी एक प्रकार की समानता देखने को मिलती है, परंतु इनके गुणों में अंतर होता है। गर्मी की मानसून हवाओं की भाँति सर्दी की मानसून हवाओं से लगातार वर्षा नहीं होती। ठंडी मानसून की हवाएँ झोकों में वर्षा करती हैं। मूसलाधार वर्षा के साथ इन झोकों में ठंडी हवा के झोंके भी सुनाई देते हैं। मानसून की हवाएँ ही देश का भविष्य तय करती हैं। मानसून देश की दिशा-दशा निर्धारित करता है। देश का भविष्य मानसून के दामन में छिपा हुआ होता है। कृषि प्रधान प्रदेशों का भविष्य मानसून पर निर्भर करता है। अंततः किसानों को मानसून पर ही निर्भर रहना पड़ता है। मानसून न बरसने पर किसान रब से प्रार्थना करते देखे जा सकते हैं।

