संत रविदास और अण्णा भाऊ साठे पर आधारित पांच पुस्तकों का राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने किया प्रकाशन

राज्यपाल बोले— लेखन में समाज बदलने की शक्ति, फूलों के बजाय पुस्तकें भेंट करने की परंपरा को दें बढ़ावा

मुंबई। महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा के हाथों संत रविदास और साहित्यसम्राट अण्णा भाऊ साठे के जीवन, विचार और साहित्य पर आधारित पांच पुस्तकों का प्रकाशन सोमवार को लोकभवन में चुनिंदा आमंत्रितों की उपस्थिति में किया गया। इस अवसर पर राज्यपाल ने कहा कि लेखन समाज में परिवर्तन लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और महान व्यक्तित्वों के जीवन एवं कार्य पर लिखा गया साहित्य उनके विचारों और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम करता है। राज्यपाल ने तहसीलदार स्नेहलता स्वामी (बिंदू) द्वारा लिखित ‘संत रविदास म्हणे’ पुस्तक का प्रकाशन किया। इसके साथ ही मातंग साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ. धनाजी उर्फ धनंजय सोमनाथ भिसे द्वारा संपादित ‘अण्णा भाऊ साठे : साहित्यविचार, संशोधन और चिंतन’, ‘अण्णाभाऊ साठे : आकलन और आस्वाद’ तथा ‘अण्णा भाऊ साठे : अवधारणा और जागरण’ (हिंदी) पुस्तकों का भी विमोचन किया गया। इसके अलावा डॉ. बळीराम गायकवाड़, डॉ. माणिक सोनावणे और डॉ. धनाजी उर्फ धनंजय सोमनाथ भिसे द्वारा संपादित अंग्रेजी पुस्तक ‘अण्णाभाऊ साठे : अ ट्रांसनैशनल लिटरेरी लेगेसी’ का भी प्रकाशन किया गया। राज्यपाल ने कहा कि साहित्य का अंतिम उद्देश्य समाज में एकता और सद्भाव को बढ़ावा देना तथा जीवन को बेहतर बनाना है। भारत की संत परंपरा समानता की एक महत्वपूर्ण सामाजिक आंदोलन रही है, लेकिन इस आंदोलन के योगदान का इतिहास में पर्याप्त दस्तावेजीकरण नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि भारत की संत परंपरा अत्यंत समृद्ध और विविध रही है। महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम, बंगाल में चैतन्य महाप्रभु सहित देश के विभिन्न हिस्सों में समृद्ध भक्ति परंपरा विकसित हुई। इस पूरी संत परंपरा के केंद्र में समानता का संदेश रहा। संतों ने समाज को बताया कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना महत्व और योगदान है।
राज्यपाल ने कहा कि साहित्य विभिन्न भाषाओं और पीढ़ियों को जोड़ने का काम करता है। समय के साथ लोग फिल्मी कलाकारों और राजनेताओं को भूल सकते हैं, लेकिन महान लेखकों और कवियों को नहीं भूलते। कालिदास, मुंशी प्रेमचंद और शेक्सपियर की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि श्रेष्ठ लेखन मन और हृदय दोनों को प्रभावित करता है। उन्होंने महाराष्ट्र की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए लोगों से फूलों के बजाय पुस्तकें भेंट करने की अपील की। राज्यपाल ने कहा कि फूल मुरझा जाते हैं, लेकिन पुस्तक लंबे समय तक लोगों के बीच रहती है। किसी पुस्तक के केवल दो पृष्ठ भी किसी पाठक के विचारों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि लेखन लेखकों के विचारों और कल्पनाओं को पंख देता है तथा उसमें लोगों को प्रेरित करने और सामाजिक परिवर्तन लाने की शक्ति होती है। इसलिए लेखन और लेखकों को प्रोत्साहित करने के साथ देश की समृद्ध साहित्यिक विरासत को संरक्षित कर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। पुस्तक प्रकाशन समारोह में पद्मश्री रमेश पतंगे, पद्मश्री गिरीश प्रभुणे, मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रवींद्र कुलकर्णी, विष्णु वझे और आर्टी के प्रबंध निदेशक सुनील वारे सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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