HomeIndiaट्रंप के राजनीतिक समर्थन के कूटनीतिक निहितार्थ

ट्रंप के राजनीतिक समर्थन के कूटनीतिक निहितार्थ

राज कुमार सिन्हा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यह संकेत देना कि किसी बाहरी हमले की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा होगा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। हालांकि इसे औपचारिक सुरक्षा गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन यह स्पष्ट रूप से बताता है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख रणनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन और भारत-चीन सीमा विवाद जैसे मुद्दों ने भारत की सामरिक भूमिका को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इसी कारण अमेरिका भारत के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और भू-राजनीतिक सहयोग को लगातार विस्तार दे रहा है। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है, लेकिन दोनों देशों के बीच ऐसा कोई सैन्य गठबंधन या कानूनी समझौता नहीं है, जैसा कि उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य देशों के बीच होता है। इसलिए ट्रंप के किसी भी बयान को औपचारिक सैन्य प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और रणनीतिक संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। भारत और अमेरिका ने पिछले वर्षों में रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास, तकनीकी साझेदारी, खुफिया सहयोग और रक्षा उत्पादन में तेजी आई है। इसके बावजूद भारत ने अपनी विदेश नीति की मूल भावना यानी रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रखा है। भारत किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की नीति पर कायम है। यहीं सबसे बड़ी चुनौती भी मौजूद है। डोनाल्ड ट्रंप का राजनीतिक व्यवहार अक्सर अप्रत्याशित रहा है। एक ओर वे भारत को महत्वपूर्ण साझेदार बताते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत के निर्यात पर टैरिफ लगाने, रूस से तेल खरीदने पर आलोचना करने और व्यापारिक दबाव बनाने से भी नहीं हिचकिचाते। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका की विदेश नीति स्थायी मित्रता से अधिक अपने आर्थिक और सामरिक हितों पर आधारित होती है। भारत ने भी कई मौकों पर यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार नीति और विदेश नीति किसी बाहरी दबाव से संचालित नहीं होगी। रूस से तेल खरीदने का निर्णय भारत की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों पर आधारित है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति केवल कूटनीतिक दबावों के आधार पर तय नहीं की जा सकती। भारत-अमेरिका संबंधों में एक अन्य संवेदनशील विषय भारत-पाकिस्तान मुद्दा है। ट्रंप कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम कराने या युद्ध रुकवाने में भूमिका निभाई है। भारत ने लगातार इन दावों को खारिज करते हुए दोहराया है कि जम्मू-कश्मीर सहित सभी द्विपक्षीय मुद्दे केवल भारत और पाकिस्तान के बीच ही सुलझाए जाएंगे और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। दूसरी तरफ रूस आज भी भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। शीत युद्ध के समय से ही तत्कालीन सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में कई महत्वपूर्ण अवसरों पर भारत का समर्थन किया। आज भी भारत की सैन्य संरचना का बड़ा हिस्सा रूसी उपकरणों पर आधारित है। परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच गहरे संबंध बने हुए हैं।भारत और रूस का संबंध केवल खरीदार-विक्रेता का नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी का है। भारत के लिए आने वाला दशक किसके साथ खड़ा होना है का नहीं, बल्कि सभी के साथ संतुलन बनाकर अपने हितों को सुरक्षित रखने का होगा। भारत अब किसी सैन्य गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिका भारत के लिए प्रौद्योगिकी, निवेश और चीन के बढ़ते प्रभाव के संतुलन का महत्वपूर्ण साझेदार है, जबकि रूस ऊर्जा, रक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक भरोसे का आधार बना हुआ है। भारत की वास्तविक ताकत इसी बहुध्रुवीय कूटनीति में निहित है। ट्रंप के बयानों को भारत के लिए स्थायी सुरक्षा गारंटी मानना जल्दबाजी होगी। अमेरिकी राजनीति में नेतृत्व बदलने के साथ नीतियां भी बदल जाती हैं। इसलिए भारत को किसी एक देश पर निर्भर होने के बजाय अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता, आर्थिक शक्ति और कूटनीतिक स्वतंत्रता को और मजबूत करना होगा। 21वीं सदी की नई विश्व व्यवस्था में भारत की सबसे बड़ी सफलता यही होगी कि वह अमेरिका के साथ साझेदारी, रूस के साथ भरोसा और वैश्विक दक्षिण के साथ नेतृत्व,इन तीनों को एक साथ संतुलित रख सके। यही भारत की वास्तविक रणनीतिक शक्ति है। 

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