
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मुंबई पुलिस की कड़ी आलोचना करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना और असहमति व्यक्त करना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि नागरिकों को सरकार का “गुलाम” नहीं बनाया जा सकता और पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि जनता की सेवक है। न्यायमूर्ति माधव जे. जामदार की एकल पीठ ने ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया’ (SDPI) के महाराष्ट्र महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी को एक वर्ष के लिए मुंबई और आसपास के जिलों से जिला बदर करने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि क्या केवल सरकार से असहमति जताने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर उन्हें डराने की कोशिश की जा रही है। न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक नेताओं या सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना, नारे लगाना और अपनी राय व्यक्त करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जामदार ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “नागरिकों को केंद्र सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता। पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक नहीं है। वे जनसेवक हैं। क्या उन पर ये मामले इसलिए दर्ज किए गए क्योंकि वे किसी दूसरी पार्टी से हैं? अगर वे पाला बदल लें, तो ऐसे सभी मामले खत्म हो जाएंगे। पूरे देश में हॉर्स-ट्रेडिंग (दलबदल) हो रही है।” यह मामला तब सामने आया जब 49 वर्षीय सईद अहमद ने दिसंबर 2025 में जारी उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके तहत उन्हें एक वर्ष के लिए मुंबई से बाहर कर दिया गया था। पुलिस का दावा था कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हुए थे। पुलिस के अनुसार, सईद अहमद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर बिना अनुमति विरोध प्रदर्शन आयोजित किए, भाषण दिए और लोगों को एकत्रित किया, जिससे यातायात बाधित हुआ तथा कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न हुई। इन्हीं आधारों पर उनके विरुद्ध जिला बदर की कार्रवाई की गई थी। राज्य सरकार ने भी अदालत में पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन पुलिस की अनुमति के बिना किए गए थे, इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई उचित थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 सम्मानपूर्वक जीवन जीने की गारंटी देता है। केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति ने शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी नीतियों का विरोध किया है, उसके मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाना संविधान की भावना के विपरीत होगा। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती असहमति की आवाज़ों से होती है। यदि सरकार की आलोचना को ही कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मान लिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करेगा। शांतिपूर्ण विरोध और असहमति किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान हैं और राज्य का दायित्व इन अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित करना। बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि सरकार की आलोचना और राष्ट्रविरोधी गतिविधियां एक समान नहीं हैं। न्यायालय ने अपने फैसले के माध्यम से यह संदेश दिया है कि पुलिस प्रशासन को राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान और कानून के दायरे में रहकर निष्पक्ष तरीके से कार्य करना चाहिए।



