
मुंबई। महानगर की चमक-दमक के बीच मानखुर्द से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मानखुर्द के साहित्यरत्न अण्णाभाऊ साठे नगर और लोकशाही नगर इलाके में प्रशासन द्वारा चलाए गए बुलडोजर ने करीब 1400 झोपड़ियों को ध्वस्त कर दिया, जिससे हजारों परिवार बेघर हो गए।
सुबह-सुबह शुरू हुई कार्रवाई
बताया जाता है कि 8 अप्रैल की सुबह भारी पुलिस बल के साथ बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और जिला प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंचीं। कुछ ही घंटों में पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया और करीब 11 एकड़ भूमि पर बनी झोपड़ियों को गिराने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। प्रशासन का कहना है कि यह जमीन महाराष्ट्र राजस्व विभाग की है, जिस पर अवैध कब्जा किया गया था। अधिकारियों के अनुसार, इस जमीन पर भविष्य में बच्चों के लिए ‘विज्ञान पार्क’ और आदिवासी संस्कृति को दर्शाने वाला एक विरासत केंद्र विकसित किया जाएगा।
बेघर हुए परिवारों का दर्द
इस कार्रवाई के बाद प्रभावित परिवार खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हो गए हैं। भीषण गर्मी में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सड़क किनारे बैठे नजर आए। कई लोगों का आरोप है कि उन्हें अपना सामान तक समेटने का पर्याप्त समय नहीं मिला, जिससे घरेलू सामान मलबे में दब गया। बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। कई विद्यार्थियों की किताबें और जरूरी दस्तावेज मलबे में खो गए, जिससे उनकी परीक्षाएं प्रभावित हो सकती हैं।
नोटिस और पुनर्वास पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें केवल 48 घंटे पहले नोटिस दिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार इस तरह की कार्रवाई से पहले पर्याप्त समय और पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। पुनर्वास को लेकर भी स्पष्टता नहीं होने से लोगों में आक्रोश है। उनका कहना है कि वर्षों से यहां रहने के बावजूद उन्हें कोई वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई।
विकास बनाम विस्थापन पर बहस
इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शहरी विकास की कीमत पर गरीबों को बेघर करना उचित है। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से सवाल किया है कि यदि जमीन पर अवैध कब्जा था, तो इतने वर्षों तक बिजली-पानी और अन्य सुविधाएं कैसे उपलब्ध कराई जाती रहीं। फिलहाल, इलाके में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और प्रभावित परिवार प्रशासन से पुनर्वास और राहत की मांग कर रहे हैं।




