
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को शिपिंग के डिप्टी डायरेक्टर जनरल को निर्देश दिया कि नाविक दीक्षित सोलंकी के पार्थिव शरीर को अपने कब्ज़े में लेकर डीएनए परीक्षण के लिए फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL), कलीना (मुंबई) को सौंपा जाए। कोर्ट ने कहा कि परीक्षण रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद उसकी एक प्रति सोलंकी के परिवार को उपलब्ध कराई जाए। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने यह आदेश उस समय दिया, जब अदालत को बताया गया कि दीक्षित सोलंकी का पार्थिव शरीर रविवार को भारत लाया गया था, लेकिन पहचान में आ रही कठिनाइयों के कारण परिवार अब तक उसे अपने कब्ज़े में नहीं ले पाया है। परिवार की ओर से पेश वकील प्रज्ञा तालेकर ने डीएनए रिपोर्ट के लिए समयसीमा तय करने की मांग की, हालांकि कोर्ट ने इस पर कोई निर्देश जारी नहीं किया। दीक्षित सोलंकी, जो तेल टैंकर MT MKD Vyom पर ऑयलर के रूप में कार्यरत थे, की 4 मार्च को ओमान तट के पास एक संदिग्ध ड्रोन बोट हमले में मौत हो गई थी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच इस तरह के समुद्री हमले में किसी भारतीय की यह पहली मौत मानी जा रही है। इस मामले में संचार की कमी और जानकारी न मिलने का आरोप लगाते हुए उनके पिता अमृतलाल सोलंकी और बेटी मिताली सोलंकी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में कहा गया कि घटना के लगभग एक महीने बाद भी परिवार को जांच और फोरेंसिक रिकॉर्ड से जुड़ी ठोस जानकारी नहीं मिल पा रही है। सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से पेश वकील रुई रोड्रिग्स ने बताया कि डीएनए परीक्षण के लिए मुंबई पुलिस आयुक्त और हैदराबाद स्थित एफएसएल निदेशक को पत्र भेजे गए थे, क्योंकि आवश्यक विशेषज्ञता स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि पार्थिव शरीर फिलहाल एक अंतिम संस्कार सेवा प्रदाता के पास सुरक्षित रखा गया है और परिवार को सौंपने से पहले सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जब मुंबई में ही फोरेंसिक सुविधा उपलब्ध है, तो पार्थिव शरीर को हैदराबाद भेजने का निर्णय क्यों लिया गया। इसके बाद अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पार्थिव शरीर को मुंबई स्थित एफएसएल को ही सौंपा जाए और रिपोर्ट आने के बाद परिवार को उपलब्ध कराई जाए, ताकि पहचान की प्रक्रिया शीघ्र और पारदर्शी तरीके से पूरी हो सके।




