
डॉ.रविशंकर कुमार चौधरी
राजीव गांधी की कहानी में एक गहरी त्रासदी छिपी है। वे ऐसे समय में भारत के नेतृत्व में आए, जब देश का एक बड़ा हिस्सा अभी 20वीं सदी की चुनौतियों से जूझ रहा था, लेकिन उनकी दृष्टि 21वीं सदी के भारत पर टिकी हुई थी। वे केवल वर्तमान की समस्याओं का समाधान नहीं खोज रहे थे, बल्कि आने वाले भारत की बुनियाद तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। 40 वर्ष की आयु में देश के प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी स्वतंत्र भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में थे। उनके सामने एक विशाल और जटिल भारत था, जहाँ एक ओर गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता और ग्रामीण पिछड़ापन जैसी समस्याएँ थीं, वहीं दूसरी ओर विज्ञान, तकनीक और आधुनिक संचार की दुनिया तेजी से बदल रही थी। राजीव गांधी ने इस बदलती दुनिया को बहुत जल्दी पहचान लिया था। उनकी राजनीतिक सोच का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था, भारत को तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से आधुनिक बनाना। कंप्यूटर और सूचना-प्रौद्योगिकी को लेकर उस दौर में देश में अनेक आशंकाएँ थीं। यह डर भी था कि मशीनें रोजगार छीन लेंगी लेकिन राजीव गांधी ने तकनीक को केवल मशीन नहीं, बल्कि विकास और नए अवसरों का माध्यम माना। कंप्यूटरीकरण, दूरसंचार के विस्तार और आधुनिक तकनीकी संस्थानों को प्रोत्साहन देने की दिशा में उनके कार्यों ने आगे चलकर उस डिजिटल भारत की आधारभूमि तैयार की, जिसकी कल्पना आज सामान्य लगती है। दूरसंचार के क्षेत्र में भी उनके समय में महत्वपूर्ण परिवर्तन शुरू हुए। ग्रामीण और शहरी भारत के बीच संचार की दूरी कम करने का प्रयास हुआ। तकनीक को आम आदमी तक पहुँचाने की सोच ने आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक और सामाजिक संरचना को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजीव गांधी की आधुनिकता केवल कंप्यूटर और तकनीक तक सीमित नहीं थी। वे लोकतंत्र को नीचे तक ले जाने के पक्षधर थे। पंचायतों को अधिक अधिकार और संस्थागत मजबूती देने की दिशा में उन्होंने पहल की। बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायती राज और नगरीय निकायों को संवैधानिक आधार मिला। इस प्रक्रिया की वैचारिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने में राजीव गांधी सरकार की पहल का महत्वपूर्ण स्थान था। युवाओं को लोकतंत्र से जोड़ने के लिए मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने का निर्णय भी उनके कार्यकाल की एक ऐतिहासिक पहल थी। इसका अर्थ केवल मतदान की उम्र कम करना नहीं था, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं को यह संदेश देना था कि वे भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के सक्रिय भागीदार हैं। महिलाओं और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी उस दौर में अधिक गंभीरता से चर्चा होने लगी। राजीव गांधी की राजनीति में यह विश्वास दिखाई देता है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब सत्ता और निर्णय-प्रक्रिया में समाज के अधिक से अधिक वर्गों की भागीदारी होगी। उनके प्रधानमंत्री काल में शिक्षा और मानव संसाधन को भी आधुनिक भारत की आधारशिला के रूप में देखा गया। नई शिक्षा नीति 1986 के माध्यम से शिक्षा के विस्तार, साक्षरता और गुणवत्ता सुधार की दिशा में प्रयास हुए। ग्रामीण प्रतिभाओं को बेहतर अवसर देने के उद्देश्य से जवाहर नवोदय विद्यालय जैसी पहल भी इसी दौर में सामने आई। विदेश नीति के क्षेत्र में भी राजीव गांधी ने अपेक्षाकृत युवा और आधुनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने और नए संवाद की शुरुआत की दिशा में उनका 1988 का चीन दौरा महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय से जटिल बने संबंधों के बीच बातचीत और संवाद के रास्ते को महत्व देना उनकी विदेश नीति की एक उल्लेखनीय विशेषता थी। देश के भीतर पंजाब जैसे गंभीर संकटों का राजनीतिक समाधान खोजने का प्रयास भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। राजीव-लोंगोवाल समझौते ने यह संकेत दिया कि जटिल राजनीतिक और क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान केवल कठोरता से नहीं, बल्कि संवाद और समझौते के माध्यम से भी खोजा जा सकता है। यद्यपि बाद की परिस्थितियों ने इस प्रयास को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने दी, फिर भी शांति की दिशा में राजनीतिक पहल का महत्व कम नहीं होता। राजीव गांधी की राजनीतिक यात्रा जितनी तेज थी, उतनी ही दुखद ढंग से अचानक समाप्त हो गई। 21 मई 1991 को उनकी हत्या कर दी गई। उस समय वे केवल 46 वर्ष के थे। एक ऐसा युवा नेता, जिसके सामने अभी जीवन और राजनीति के कई दशक शेष हो सकते थे, अचानक इतिहास का हिस्सा बन गया। यहीं से एक स्वाभाविक लेकिन अनुत्तरित प्रश्न जन्म लेता है कि यदि राजीव गांधी को बीस या तीस वर्ष और मिले होते, तो आज का भारत कैसा होता? इस प्रश्न का निश्चित उत्तर इतिहास नहीं दे सकता। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि उनके नेतृत्व में भारत निश्चित रूप से किसी एक विशेष दिशा में चला जाता। लोकतंत्र अनेक शक्तियों, परिस्थितियों और व्यक्तियों के सामूहिक प्रभाव से बनता है। फिर भी यह कल्पना करना असंगत नहीं है कि उनकी तकनीकी आधुनिकता, युवा-केंद्रित सोच, विकेंद्रीकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारतीय राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सकते थे। आज जब भारत डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, संचार क्रांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई चुनौतियों से गुजर रहा है, तब राजीव गांधी की उस शुरुआती दृष्टि को याद करना स्वाभाविक है। उन्होंने उस समय कंप्यूटर और आधुनिक संचार की बात की, जब इन शब्दों का भारत के सामान्य जनजीवन से बहुत सीमित संबंध था। आज जब समाज में नफरत, अविश्वास और सांप्रदायिक कटुता को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या एक ऐसी राजनीति, जो आधुनिकता के साथ सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक भागीदारी को आगे बढ़ाती, भारत को किसी अलग दिशा में ले जा सकती थी? इसका उत्तर इतिहास के पास नहीं है, लेकिन यह प्रश्न हमारे वर्तमान के लिए अवश्य महत्वपूर्ण है। राजीव गांधी की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को भविष्य की ओर देखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि आने वाला भारत केवल बड़े उद्योगों या आर्थिक विकास से नहीं बनेगा, बल्कि विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, लोकतांत्रिक भागीदारी और युवाओं की ऊर्जा से बनेगा। राजीव गांधी जी की राजनीति की आलोचनाएँ भी हैं और उनके निर्णयों पर गंभीर बहस भी हो सकती है। इतिहास के किसी भी नेता को केवल श्रद्धा या निंदा के एकांगी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। राजीव गांधी को भी उनकी उपलब्धियों, सीमाओं, राजनीतिक निर्णयों और उनके समय की परिस्थितियों के समग्र संदर्भ में समझना आवश्यक है,फिर भी उनकी असमय मृत्यु एक ऐसी ऐतिहासिक त्रासदी है, जिसकी पीड़ा आज भी महसूस की जा सकती है। 46 वर्ष की आयु में समाप्त हुई उनकी जीवन-यात्रा अपने पीछे एक अधूरा प्रश्न छोड़ गई। एक ऐसे भारत का प्रश्न, जो अपनी परंपराओं को साथ लेकर आधुनिक विज्ञान और तकनीक की शक्ति से 21वीं सदी की ओर बढ़ना चाहता था। आज हम केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को याद नहीं कर रहे हैं। हम उस युवा भारतीय को भी स्मरण कर रहे हैं, जिसके सपने उसकी उम्र से कहीं आगे थे। वह भारत को आने वाले समय के लिए तैयार करना चाहता था और उसने अपने कार्यकाल में उस भविष्य की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम भी उठाए। उनकी यात्रा बहुत जल्दी समाप्त हो गई, लेकिन उनकी कल्पना का भारत आज भी हमारे सामने एक प्रश्न की तरह खड़ा है कि क्या हम उस आधुनिक, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और समावेशी भारत को आगे बढ़ा पा रहे हैं, जिसकी ओर राजीव गांधी ने अपनी युवा दृष्टि से संकेत किया था? शायद राजीव गांधी को याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनके सपनों को केवल स्मारकों और समारोहों तक सीमित न रखें, बल्कि उस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें, जिसमें विज्ञान हो, आधुनिकता हो, लोकतांत्रिक सहभागिता हो, सामाजिक सद्भाव हो और युवाओं के लिए भविष्य की नई संभावनाएँ हों। राजीव गांधी आज भी उस भारत की कल्पना में जीवित हैं, जिसे उन्होंने देखने का सपना देखा था,एक ऐसा भारत जो अपने अतीत की जड़ों से जुड़ा हो, लेकिन अपनी दृष्टि भविष्य पर रखता हो।

