
देश में जन्म और मृत्यु का समयबद्ध एवं प्रमाणिक पंजीकरण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुशासन की आधारशिला है। यही आंकड़े जनसंख्या, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक कल्याण, निर्वाचन व्यवस्था और विकास योजनाओं की दिशा तय करते हैं। इसके साथ ही नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करने तथा अवैध घुसपैठ और फर्जी दस्तावेजों पर अंकुश लगाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में संसद द्वारा पारित ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक’ नागरिक पंजीकरण प्रणाली को अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है। नए कानून के तहत यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण दो वर्ष से अधिक की देरी से कराया जाता है, तो अब केवल प्रशासनिक अनुमति पर्याप्त नहीं होगी। ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। सरकार का तर्क है कि इससे फर्जी पंजीकरण, जाली दस्तावेजों और पहचान संबंधी धोखाधड़ी पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी। वर्तमान समय में जब जन्म प्रमाण पत्र अनेक सरकारी सेवाओं, पहचान और नागरिकता संबंधी प्रक्रियाओं का आधार बन चुका है, तब इस व्यवस्था को मजबूत करना निश्चित रूप से आवश्यक है। हालांकि, किसी भी कानून का मूल्यांकन केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक प्रभाव से भी किया जाना चाहिए। देश ने पिछले वर्षों में जन्म और मृत्यु पंजीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज अधिकांश जन्म और मृत्यु का पंजीकरण हो रहा है। वास्तविक चुनौती यह नहीं है कि पंजीकरण नहीं हो रहा, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इसकी सूचना निर्धारित समय सीमा के भीतर दर्ज हो। इसलिए सरकार को प्रक्रियाओं को और सरल तथा सुलभ बनाने पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आज भी अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं, प्रशासनिक सुविधाएं और डिजिटल व्यवस्था पूरी तरह सुलभ नहीं हैं। दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी इलाकों, प्रवासी मजदूरों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा जागरूकता के अभाव में रहने वाले लोगों के लिए समय पर पंजीकरण कराना हमेशा आसान नहीं होता। ऐसे मामलों में यदि विलंब होने पर न्यायिक प्रक्रिया अनिवार्य कर दी जाती है, तो इससे आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक और प्रशासनिक बोझ पड़ सकता है। यह भी विचारणीय है कि दो वर्ष की समय-सीमा निर्धारित करने के पीछे क्या व्यावहारिक आधार है। अनेक परिस्थितियां ऐसी होती हैं जिनमें परिवार चाहकर भी समय पर पंजीकरण नहीं करा पाते। ऐसे मामलों में कानून का उद्देश्य नागरिकों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्था से जोड़ना होना चाहिए। इसलिए जहां फर्जीवाड़े के खिलाफ सख्ती आवश्यक है, वहीं वास्तविक और विवश नागरिकों के लिए प्रक्रिया सरल और संवेदनशील भी होनी चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी रहा कि इतना महत्वपूर्ण विधेयक संसद में व्यापक चर्चा का विषय नहीं बन सका। किसी भी ऐसे कानून पर, जिसका प्रभाव प्रत्येक नागरिक की कानूनी पहचान और भविष्य पर पड़ने वाला हो, विस्तृत बहस होना लोकतंत्र की आवश्यकता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का दायित्व था कि वे इस विषय पर गंभीर चर्चा कर जनता के समक्ष सभी पहलुओं को स्पष्ट करते। सरकार का उद्देश्य यदि फर्जी पंजीकरण रोकना और नागरिक पंजीकरण प्रणाली को मजबूत बनाना है, तो उसके साथ-साथ जनजागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए। जन्म और मृत्यु का पंजीकरण निर्धारित समय सीमा में कराने के लिए लोगों को प्रेरित करना, ग्रामीण क्षेत्रों में पंजीकरण की सुविधा बढ़ाना और डिजिटल सेवाओं को अधिक सरल बनाना भी उतना ही आवश्यक है। एक सशक्त नागरिक पंजीकरण प्रणाली सुशासन की पहचान है, लेकिन उसकी सफलता तभी मानी जाएगी जब वह सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ-साथ प्रत्येक वास्तविक नागरिक के अधिकारों की भी रक्षा करे। फर्जीवाड़े पर कठोर कार्रवाई हो, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी बने जिसमें कोई भी वास्तविक नागरिक केवल प्रक्रियागत कठिनाइयों के कारण अपनी कानूनी पहचान से वंचित न रह जाए। यही संतुलन अच्छे प्रशासन और संवेदनशील शासन की वास्तविक पहचान है।

