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मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के किसान कल्याण वर्ष में प्रदर्शन को मजबूर किसान

पवन वर्मा
मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव की सरकार ने वर्ष 2026 को पूरे उत्साह के साथ “किसान कल्याण वर्ष” घोषित किया है। सरकारी विज्ञापनों में किसानों के सम्मान, समृद्धि और कल्याण के दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मंचों से किसानों को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हैं लेकिन सत्ता के इन दावों और जमीन की हकीकत के बीच की दूरी शायद कभी इतनी स्पष्ट नहीं दिखी, जितनी इन दिनों भोपाल की सड़कों पर दिखाई दे रही है। नर्मदापुरम संभाग से आए हजारों मूंग उत्पादक किसान अपनी ही सरकार से अपनी ही फसल खरीदने की मांग लेकर राजधानी भोपाल पहुंचे। उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेड लगाए, लेकिन किसान बैरिकेडिंग तोड़कर शहर में प्रवेश कर गए। दिनभर प्रदर्शन के बाद रात को यही किसान खुले आसमान के नीचे खाना बनाने, सड़क पर सोने को मजबूर हो गए। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि जिस वर्ष को सरकार ने “किसान कल्याण वर्ष” का नाम दिया है, उसी वर्ष किसान अपनी मेहनत की फसल का दाम मांगने के लिए राजधानी की सड़कों पर रात गुजार रहे हैं। इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान किसी नई योजना, कर्जमाफी या मुफ्त सहायता की मांग नहीं कर रहे हैं। वे केवल इतना चाहते हैं कि सरकार जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है, उसी पर उनकी पूरी मूंग की सरकारी खरीदी हो,उनकी दूसरी मांग है की खाद वितरण में ई-टोकन व्यवस्था खत्म हो,तीसरी मांग है कि कम बारिश में भी पर्याप्त बिजली दी जाए। इधर मूंग के समर्थन मूल्य से खरीदी करने के साथ सरकार ने ऐसी शर्तें जोड़ दीं हैं कि अधिकांश उपज किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ रही है। सरकार की घोषणा और किसान की वास्तविक आय के बीच यही अंतर आज आंदोलन का कारण बना है। जब आंदोलन तेज हुआ और किसानों का आक्रोश राजधानी तक पहुंच गया, तब मोहन सरकार ने समस्या का समाधान खोजने के बजाय उसका ठीकरा केंद्र सरकार के सिर फोड़ना शुरू कर दिया। राज्य सरकार ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग की। पत्र में स्वयं स्वीकार किया गया कि प्रदेश में लगभग 4.30 लाख हेक्टेयर में मूंग बोई गई है, अनुमानित उत्पादन 20.60 लाख मीट्रिक टन है तथा लगभग 8.06 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी की आवश्यकता है। लेकिन अब सरकार कह रही है कि केंद्र ने केवल 4.54 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य स्वीकृत किया, इसलिए पूरी खरीदी संभव नहीं हो पा रही। यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि राज्य सरकार को पहले से पता था कि उत्पादन इतना अधिक होगा, तो उसने समय रहते केंद्र से पर्याप्त लक्ष्य क्यों सुनिश्चित नहीं कराया? यदि उत्पादन का अनुमान सरकार के पास था, तो किसानों का पंजीयन क्यों कराया गया? खरीदी की तैयारी क्यों नहीं की गई? और यदि सारी जिम्मेदारी केंद्र की ही है, तो फिर किसान कल्याण वर्ष का श्रेय लेने का अधिकार केवल राज्य सरकार को कैसे मिल जाता है? उपलब्धि अपनी और विफलता किसी दूसरे की। यह राजनीति किसानों की समझ से परे नहीं है।
सच तो यह है कि यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। यह प्रशासनिक लापरवाही और नीति निर्माण में दूरदृष्टि के अभाव का परिणाम है। सरकार खेती को बढ़ावा देती है, अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करती है, आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रचार करती है, लेकिन जब किसान मेहनत करके अच्छी पैदावार ले आता है तो वही सरकार उसकी पूरी उपज खरीदने से पीछे हट जाती है। किसान के लिए इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है? आखिर सरकार संदेश क्या देना चाहती है, अधिक उत्पादन करो या मत करो?
मध्य प्रदेश लंबे समय तक दलहन उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य रहा है। चना, मसूर, अरहर और मूंग ने प्रदेश को अलग पहचान दिलाई। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दलहन का रकबा लगातार घट रहा है। यदि मूंग उत्पादकों को भी उचित मूल्य नहीं मिलेगा तो वे स्वाभाविक रूप से दूसरी फसलों की ओर जाएंगे। इसका नुकसान केवल किसानों को नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को होगा। नर्मदापुरम, हरदा, सीहोर, रायसेन, भोपाल और नरसिंहपुर का इलाका मूंग उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। विडंबना यह है कि आज सबसे अधिक आक्रोश भी इसी क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। यही वे किसान हैं जिन्होंने सरकार की कृषि नीतियों पर भरोसा किया, उत्पादन बढ़ाया और अब अपनी उपज का मूल्य पाने के लिए आंदोलन करने को मजबूर हैं। राजनीतिक दृष्टि से भी यह आंदोलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन इलाकों के किसान सड़क पर हैं, उनमें केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का प्रभाव क्षेत्र भी शामिल है। ये क्षेत्र भाजपा के सुरक्षित गढ़ भी माने जाते हैं। जिन क्षेत्रों को भाजपा अपना सबसे सुरक्षित राजनीतिक गढ़ मानती है, वहीं से यदि किसान सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं तो यह केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक चेतावनी भी है। किसान जब नाराज होता है तो उसका असर मंडी तक सीमित नहीं रहता, वह समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है। मोहन सरकार की कार्यशैली पर भी यह आंदोलन गंभीर सवाल खड़े करता है। पिछले डेढ़ वर्ष में कई ऐसे फैसले सामने आए हैं जिनमें पहले निर्णय लिया गया और बाद में विरोध के बाद सफाई दी गई। उज्जैन की भूमि पूलिंग योजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। किसानों और भारतीय किसान संघ सहित कई संगठनों के विरोध के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा। अब मूंग खरीदी के मामले में भी वही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। सरकार पहले निर्णय लेती है, फिर आंदोलन होता है, उसके बाद जिम्मेदारी किसी और पर डालने की कोशिश करती है। यह प्रशासन नहीं, संकट प्रबंधन की विफल शैली है। फिलहाल सबसे अधिक पीड़ादायक दृश्य भोपाल की सड़कों पर देखने को मिला। जिन किसानों को सरकार ‘अन्नदाता’ कहकर सम्मानित करती है, वही किसान राजधानी में खुले आसमान के नीचे खाना बनाने, रात बिताने को मजबूर हैं। भोपाल के लाखों रहवासी जाम से परेशान हो रहे हैं। सरकार के विज्ञापनों में किसानों के चेहरे मुस्कुराते हैं, लेकिन वास्तविक किसान सड़क पर बैठा अपनी उपज का मूल्य मांग रहा है। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। सरकार यह तर्क दे सकती है कि खरीदी का लक्ष्य केंद्र तय करता है। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन किसान ने अपनी फसल राज्य सरकार की कृषि नीतियों पर भरोसा करके बोई थी। उसके लिए यह बहस कोई मायने नहीं रखती कि जिम्मेदार भोपाल है या दिल्ली। किसान को केवल अपनी मेहनत का पूरा दाम चाहिए। यदि राज्य सरकार समय रहते केंद्र से पर्याप्त लक्ष्य सुनिश्चित नहीं करा सकी, तो यह भी उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी है। “किसान कल्याण वर्ष” का वास्तविक मूल्यांकन सरकारी विज्ञापनों, होर्डिंगों और भाषणों से नहीं होगा। उसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि किसान को उसकी उपज का कितना मूल्य मिला, उसकी आय कितनी बढ़ी और संकट के समय सरकार उसके साथ कितनी मजबूती से खड़ी रही। आज की तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है। किसान आंदोलन कर रहा है, सड़क पर रात बिता रहा है और सरकार केंद्र को पत्र लिखकर अपनी जिम्मेदारी कम करने की कोशिश कर रही है। मोहन सरकार को यह समझना होगा कि किसान केवल वोटर नहीं, प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उसकी उपेक्षा का राजनीतिक और आर्थिक दोनों मूल्य चुकाना पड़ता है। यदि “किसान कल्याण वर्ष” में भी किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाने के लिए राजधानी की सड़कों पर संघर्ष करने को मजबूर है, तो समस्या किसानों में नहीं, सरकार की नीति और उसकी तैयारी में है। अभी भी समय है कि सरकार आंदोलन को कानून-व्यवस्था का विषय बनाने के बजाय किसान विश्वास का विषय माने और मूंग खरीदी पर ऐसा समाधान निकाले जिससे किसान को उसकी पूरी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके। अन्यथा इतिहास यह दर्ज करेगा कि मोहन सरकार के “किसान कल्याण वर्ष” की सबसे बड़ी पहचान सरकारी विज्ञापन नहीं, बल्कि भोपाल की सड़कों पर खुले आसमान के नीचे रात गुजारते मूंग उत्पादक किसान थे।

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