
मुंबई (इंद्र यादव)। भारत के संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति ‘राष्ट्र का प्रमुख’ होता है, जिसके नाम पर शासन संचालित होता है। वर्तमान में द्रौपदी मुर्मू इस पद पर आसीन हैं। एक आदिवासी महिला का इस सर्वोच्च पद तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आम नागरिक की सुरक्षा उसी अनुपात में मजबूत हुई है? आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार देश में हर वर्ष लगभग 28,000 से 30,000 हत्याएं दर्ज होती हैं। जुलाई 2022 से अब तक के समय को देखें तो यह संख्या 70,000 के पार पहुंचती नजर आती है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के उजड़ने की कहानी है। पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक राजनीतिक हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं, वहीं मणिपुर जैसे राज्यों में लंबे समय तक चली हिंसा ने कानून-व्यवस्था और संवैधानिक तंत्र की सीमाओं को उजागर किया है।हत्या केवल हथियारों से नहीं होती, बल्कि व्यवस्था की खामियां भी ‘साइलेंट किलर’ का काम करती हैं। शिक्षा प्रणाली में पेपर लीक और उससे उपजी निराशा के कारण युवाओं की आत्महत्याएं बढ़ी हैं। कोटा से लेकर उत्तर प्रदेश तक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध—हाथरस और कोलकाता जैसे मामलों ने समाज की संवेदनशीलता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।वर्तमान परिदृश्य में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो रहा है, या वह सत्ता का उपकरण बनता जा रहा है? भीड़ हिंसा (लिंचिंग) की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि कई बार न्याय व्यवस्था सड़कों पर उतर आती है। वहीं न्यायिक प्रक्रिया में देरी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। जब सजा की दर कम हो और फैसले वर्षों तक लंबित रहें, तो अपराध का जोखिम अपराधियों के लिए कम हो जाता है।इस परिदृश्य में समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हमें आंकड़ों को केवल संख्या नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी के रूप में देखना होगा। पुलिस सुधार, न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और सामाजिक जागरूकता के बिना स्थिति में बदलाव संभव नहीं है। ‘रूल ऑफ लॉ’ की स्थापना तभी होगी जब कानून का शासन निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से लागू हो।अंततः इतिहास यह नहीं पूछेगा कि उस समय राष्ट्रपति कौन था, बल्कि यह दर्ज करेगा कि जब समाज हिंसा और असुरक्षा से जूझ रहा था, तब देश की संस्थाएं और नागरिक कितने सजग थे। किसी भी शासन की सफलता केवल वैश्विक मंचों की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि उसका नागरिक कितनी सुरक्षा और गरिमा के साथ जीवन जी पा रहा है।




