
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने आधी सदी पुरानी कानूनी लड़ाई का पटाक्षेप करते हुए ठाणे के मानपाड़ा क्षेत्र की 193 एकड़ बहुमूल्य जमीन पर महाराष्ट्र सरकार का दावा खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वर्ष 1975 में बुनियादी प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण राज्य सरकार उक्त जमीन को “प्राइवेट जंगल” घोषित कर कानूनी रूप से अधिग्रहित करने में विफल रही। जस्टिस रवींद्र घुगे और अश्विन भोबे की खंडपीठ ने जमीन के मालिक मेसर्स डी. दह्याभाई एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारों को बरकरार रखते हुए ठाणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (टीएमसी) को 21 दिनों के भीतर डेवलपमेंट राइट्स सर्टिफिकेट (DRC/TDR) के रूप में वैध मुआवजा जारी करने का निर्देश दिया। 20 फरवरी को सुनाया गया यह विस्तृत 373 पृष्ठों का फैसला बुधवार देर रात उपलब्ध हुआ।
अधिग्रहण प्रक्रिया में गंभीर खामियां
मामला 1975 का है, जब राज्य सरकार ने महाराष्ट्र प्राइवेट फॉरेस्ट्स (एक्विजिशन) एक्ट, 1975 के तहत 217 एकड़ से अधिक जमीन को अधिग्रहित करने का प्रस्ताव रखा था। सरकार का दावा था कि 29 अगस्त 1975 को भारतीय वन अधिनियम के तहत जारी नोटिस के बाद जमीन वन विभाग के अधिकार में आ गई और यह संजय गांधी नेशनल पार्क का हिस्सा बन गई। हालांकि, अदालत ने पाया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया में गंभीर कानूनी त्रुटियां थीं। नोटिस वास्तविक मालिक कंपनी को न देकर “डी. दयाभाई” नामक इकाई को जारी किया गया था। साथ ही नोटिस पर एक ‘जंगल रक्षक’ (फॉरेस्ट गार्ड) के हस्ताक्षर थे, जिसके पास ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार नहीं था। खंडपीठ ने कहा कि मूल नोटिस “void ab initio” अर्थात प्रारंभ से ही अमान्य था। अदालत ने टिप्पणी की कि असली भूमि स्वामी को नोटिस न देना “गंभीर और घातक त्रुटि” है। राज्य की यह दलील भी खारिज कर दी गई कि बाद के पत्राचार से मालिक को अधिग्रहण की जानकारी थी। कोर्ट ने इसे “अटकलों पर आधारित प्रयास” बताया।
मुआवजा और संवैधानिक अधिकार
वन विभाग का कहना था कि भूमि संजय गांधी नेशनल पार्क का हिस्सा है, किंतु अदालत ने पाया कि राज्य दशकों तक निष्क्रिय बना रहा। इस दौरान वर्ष 1999 से उक्त भूमि ठाणे विकास योजना में सार्वजनिक परियोजनाओं- जैसे सड़कें, बस डिपो और ट्विन-टनल प्रोजेक्ट के लिए आरक्षित की गई। टीएमसी के वकील राम आप्टे ने अदालत को बताया कि “पार्क रिजर्वेशन नंबर 4” के अंतर्गत 100 एकड़ से अधिक भूमि पर पहले ही कब्जा लिया जा चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि का उपयोग करते हुए मालिक को मुआवजा न देना संविधान के अनुच्छेद 300ए का उल्लंघन है, जो संपत्ति के अधिकार की रक्षा करता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि राजस्व अभिलेखों में नामांतरण (म्यूटेशन एंट्री) जैसी प्रशासनिक प्रविष्टियां वैध अधिग्रहण का विकल्प नहीं हो सकतीं। ऐसी प्रविष्टियां न तो राज्य को स्वामित्व प्रदान करती हैं और न ही निजी मालिक से उसका अधिकार छीन सकती हैं। अंततः अदालत ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए भूमि स्वामी की याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए टीएमसी द्वारा पार्क क्षेत्र की प्राकृतिक हरियाली संरक्षित रखने के आश्वासन पर भी ध्यान दिया। यह फैसला न केवल अधिग्रहण प्रक्रिया में कानूनी पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है, बल्कि संपत्ति अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा को भी पुनः स्थापित करता है।




