
मुंबई। कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी और आय में अनिश्चितता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रही है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि एआई की सहायता से वैश्विक स्तर पर कृषि अनुसंधान नेटवर्क (ग्लोबल एग्रीकल्चरल रिसर्च नेटवर्क) की स्थापना की जानी चाहिए, जिससे ज्ञान, डेटा और संसाधनों का साझा उपयोग संभव हो सके। महाराष्ट्र कृषि–कृत्रिम बुद्धिमत्ता नीति के अंतर्गत आयोजित ‘एआई फॉर एग्री 2026’ शिखर सम्मेलन में एआई आधारित वैश्विक कृषि अनुसंधान नेटवर्क की स्थापना पर विस्तृत चर्चा की गई। इस परिसंवाद का समन्वयन वसंतराव नाईक मराठवाडा कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बी.वेंकटेश्वरलू ने किया। परिसंवाद में कृषि आयुक्त सूरज मांढरे, नवोन्मेष कार्यालय के निदेशक व्हिन्सेंट मार्टिन तथा नीदरलैंड्स के द हेग स्थित एग्ट्युअल के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विक्रम सरबजना ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय अर्द्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने भी मार्गदर्शन किया। विशेषज्ञों ने बताया कि एआई का उपयोग जल प्रबंधन, मौसम पूर्वानुमान, फसलों की आवश्यकता के अनुसार संसाधनों के सटीक उपयोग तथा जलवायु-सहिष्णु किस्मों के अनुसंधान में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। राज्य सरकार ने 500 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ किसान-केंद्रित नीति अपनाई है और अनेक स्टार्टअप प्रस्तावों में से उपयोगी, किफायती एवं विस्तार योग्य परियोजनाओं का चयन किया गया है। राज्य में मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा, किसान पहचान प्रणाली और ‘महाविस्तार’ जैसे प्लेटफॉर्म पहले से उपलब्ध हैं। अब डेटा साझा करना, सहयोगात्मक अनुसंधान, नीतिगत सुधार और शिक्षा में एआई को मुख्यधारा में शामिल किया जा रहा है। कृषि आयुक्त सूरज मांढरे ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि सभी संस्थाएं मिलकर ज्ञान, संसाधन और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करें तो किसानों की आय में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। नवोन्मेष कार्यालय के निदेशक व्हिन्सेंट मार्टिन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि 2026 में भी कृषि अनुसंधान तंत्र पूरी तरह एआई युग के अनुरूप नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी चुनौतियों के बावजूद पारंपरिक अनुसंधान से वास्तविक क्रियान्वयन तक पहुंचने में अभी भी 15 से 25 वर्ष का समय लग जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर उन क्षेत्रों तक पहुंचना चाहिए जहां इंटरनेट, स्थानीय भाषा और साक्षरता की कमी है। कृषि विश्वविद्यालयों को कृषि विज्ञान के साथ-साथ एआई, डेटा गवर्नेंस और समावेशी डिजाइन की शिक्षा देना आवश्यक है। मई महीने में रोम में आयोजित होने वाले अगले अंतरराष्ट्रीय संवाद में एआई के जिम्मेदार और नैतिक उपयोग के लिए वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा की जाएगी।
‘एआई फॉर एआर’ नेटवर्क के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर
कृषि क्षेत्र में एआई अनुसंधान को प्रोत्साहन देने के लिए महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) किए गए। महाराष्ट्र काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल एजुकेशन एंड रिसर्च (एमसीएईआर), पुणे और अंतरराष्ट्रीय अर्द्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) के बीच ‘एआई फॉर एआर’ नेटवर्क में भागीदारी हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता राज्य के चार कृषि विश्वविद्यालयों की ओर से किया गया है। इसके अतिरिक्त, एमसीएईआर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर (आईआईटी खड़गपुर) के बीच भी ‘एआई फॉर एआर’ नेटवर्क के लिए एमओयू संपन्न हुआ है। इससे कृषि अनुसंधान, डेटा विश्लेषण और तकनीकी नवाचार को नया मंच मिलने की उम्मीद है।




