Wednesday, February 25, 2026
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कहानी: बाबूजी

लेखक- विवेक रंजन श्रीवास्तव
जमाना अमिताभ बच्चन की यंग एग्रीमेन वाली फिल्मों का था। उम्र को नजर अंदाज न किया जा सके तो बाबू जी हमारे मोहल्ले के ओल्ड एंग्रीमेन कहे जा सकते थे। किसी भी मुद्दे पर जमाने से भिड़ जाना उनके खून में था। बाबूजी यूं तो बायलाजीकली अपने तीन बेटों और दो बेटियों के बाबूजी ही थे, किन्तु अपने केरेक्टर के चलते वे मोहल्ले भर के बाबूजी के रूप में ऐसे स्थापित हुए की वे अपने नाती पोतों के भी बाबूजी ही बन गए।
उस जमाने में मोहल्ला परिवार सा ही होता था। बाबू जी के सम्मुख पड़ोस की बहुएं भी उतना ही पर्दा करतीं थीं, जितना वे अपने जेठ या ससुर से करती। बाबूजी मोहल्ले के बच्चों की गलती पर भी उतना ही रौब दिखाते जितना खुद के बच्चों पर। उन दिनों जनसंख्या भी कम थी। जीविका के साधन कम थे। मनोरंजन के साधन के नाम पर तीज त्यौहार और शादियां ही थे। भोंपू वाले लाउड स्पीकर पर गाने बजाकर खुशी मनाई जाती थी। लोग समाचार पत्र, पत्रिकाएं पढ़ते थे रेडियो सुनते थे और टाकीज में सिनेमा देखने जाया करते थे। बाबूजी कोई छह फीट ऊंचे, मजबूत कद काठी, भारी आवाज वाले रौबदार शख्स थे। सफेद रंग की धोती, सफेद शर्ट और उस पर जैकेट पहन कर लाठी लेकर निकलते थे, पैरों में मोहल्ले के मोची द्वारा बनाई गई सेंडल होती थी। नई सेंडल शुरू के दिनों में पैरों की टुहनी के पास काट लेती थी जिसे मोम लगाकर , बाबूजी की लताड़ सुनते हुये मोची को ठीक करना होता था। बाबू जी सुबह उठते। आकाशवाणी के स्टेशन खुलने की ट्यून के बाद वन्देमातरम के साथ वे खखारते हुए, छोटी पीतल की बाल्टी और लोटे से,पानी लेकर बगीचे में नीम की दातौन करते। थोड़ी वर्जिश और प्राणायाम करते, उसके बाद एक एक पेड़ को निहारते, खुद क्यारी का कचरा साफ करते, और पौधों को पानी देते। इस दौरान जो भी सड़क से निकलता उससे बतियाते हुए, उन्हें देखा जा सकता था।
उस जमाने में अधिकांश लोग सायकिल पर चला करते थे। किंचित धनाढ्य लोगों के पास वेस्पा स्कूटर होते। जिनके कोई नाते रिश्तेदार विदेशों में होते, वे डालर में भुगतान कर चेतक स्कूटर ले लेते थे पर बाबू जी के पास फियट कार थीं। वे शान से स्टीयरिंग से जुड़े गियर वाली अपनी फिएट में बैठकर दुकान जाते। दुकान पर दिन भर ग्राहकों से और एक्सचेंज के जरिए कनेक्ट होने वाले फोन पर सौदे की बातचीत होती। लाल कवर वाली बही ऊपर की ओर पलट कर खुलती थी। उसमें मुनीम जी से हिसाब किताब लिखवाना उनका शगल था। दीवार में जड़ी हुई बड़ी सी तिजोरी में बड़ा अलीगढ़ी ताला खुद लगा कर दुकान बढ़ाने से पहले वे उसे खींच कर देखते। गरीबों को यथाशक्ति मदद करना, दान धर्म करना उनके व्यवहार में था। दुकान पर चाबी वाली दीवार घड़ी के नीचे एक डब्बे में चिल्लर भरी होती, हर भीख मांगने आने वाले को एक सिक्का मिलता। बहुत से नर्मदा परकम्मा वासी अपनी आवश्यकता बताते तो उन्हे वांछित मदद बाबूजी जरूर करते। दुकान से घर आने के बाद हल्का भोजन करते और रेडियो सीलोन सुनकर सो जाते। यह उनकी नियमित दिनचर्या थी। बाबू जी के बड़े दो बेटों और बेटियों की शादी हो चुकी थी। बेटियों के रिश्ते में जिन्होंने दहेज ठहराने की कोशिश की उनके यहां विवाह को वे न करने के साहसिक कदम उठा चुके थे। बेटों की शादियों में उन्होंने दहेज नहीं लिया। शादी के बाद बेटे अगल-बगल में ही रहते थे। तीसरे बेटे की शादी में उन्होंने खास मथुरा से हलवाई बुलवाए थे।उनका सोच था कि यह आखिरी मौका होगा जब इतने बड़े पैमाने पर उन्हें कस्बे के लोगों को न्यौता देने का अवसर है। हलवाई के पास भट्टी के निकट खुद बैठकर अपने निर्देशन में मिठाईयां बनवाना उनका शौक था। कस्बे के सभी हलवाई उनकी झिड़की समझते थे। मोहल्ले पड़ोस में जिसके यहां भी शादी हो या अन्य कोई त्यौहारी अवसर, हलवाई का जिम्मा वे आगे बढ़कर उठा लेते । डांट डपट , पुचकार के जरिए वे उम्दा पकवान बनवाते थे। यही मिलनसार व्यवहार उन्हें सबका बाबूजी बनाए हुए थी। बाबूजी अपने क्रांतिकारी स्वभाव के चलते मृत्यु भोज के सख्त विरोधी थे,वे दुख बांटते,दाह संस्कार में अवश्य शामिल होते पर कभी मृत्यु भोज में न जाते। छोटे बेटे की शादी के लम्बे अरसे बाद उस दिन एक बार फिर बाबूजी के घर के सामने तम्बू लगा था, हलवाई बैठा बूंदी छान रहा था, और दुखी मन से लड्डू बना रहा था, उसके हाथों शकर का बूरा ज्यादा गिर गया पर उसे झिड़कने वाले बाबूजी कहीं नहीं थे। मुनीम जी बाबू जी की बड़ी सी तस्वीर पर हार चढ़ा रहे थे। बाबूजी के अनायास हार्ट अटैक से सारा कस्बा ही हतप्रभ था। संवेदना व्यक्त करने सभी आए थे। घर में मत्यु भोज को लेकर एक मत नहीं बन पा रहा था, तब परिवार के पुरोहित की सलाह सबको मानना पड़ी। बाबू जी की चिर मुक्ति के लिए पंडितो ने तेरहवीं के पूजा पाठ पूरे विधि विधान से किए किंतु मृत्यु भोज न करने का फैसला लिया गया।
पत्तल में बाबूजी के नाम मिठाई निकाल कर गाय के सम्मुख रख दी गई। जाने कैसे हवा का तेज झोंका आया और मिठाई का दोना उड़ गया, लड्डू लुढ़क कर बाबू जी की तस्वीर के नीचे जा पहुंचा। बाबूजी की तस्वीर के पास जल रहे दीपक की शिखा तेजी से हिल रही थी। हवन का धुंआ वातावरण में घुल रहा था। धुंए में भी सबकी सजल आंखें स्पष्ट दिख रही थीं। भट्टी के पास बैठा हलवाई न चाहकर भी धार धार रो पड़ा था। चंदन की गंध दूर तक बाबू जी के क्रांतिकारी विचारों का संदेशा फैला रही थी।

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