हिंदू शब्द फारसी नहीं, भारत की पहचान है

डॉ.राघवेंद्र शर्मा
मेरे लिए हिंदू और हिंदुस्तान वह शब्द है, जिसे करोड़ों भारतीय अपनी पहचान, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना से जोड़कर देखते हैं। लेकिन कुछ लोग खासकर कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हिंदू शब्द के मनमाने अर्थ प्रस्तुत कर देते हैं। हिन्दुओं पर इतनी सहजता से कुछ भी कह देने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा? क्या हिंदू और हिंदुत्व को लेकर हर बार ऐसी ही नकारात्मक और अपमानजनक व्याख्याएं सुनते रहना होगा? तो बस, अब बहुत हुआ। अब नहीं सहेंगे हिंदू-हिंदुत्व की बेइज्जती।
आसिंधु सिंधु पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका।
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृत:॥
इसका सीधा सपाट अर्थ है कि सिंधु नदी (उत्तर-पश्चिम) से लेकर हिंद महासागर तक फैली हुई भारत की यह पूरी भूमि, जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि है, वही हिंदू कहलाता है।
हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
इस श्लोक का अर्थ है कि हिमालय से प्रारंभ होकर हिंद महासागर तक फैला हुआ यह देवताओं द्वारा निर्मित देश हिंदुस्थान कहलाता है। उपरोक्त दो प्राचीन श्लोकों से स्वतः स्पष्ट है कि हम जहां पैदा हुए और निवास कर रहे हैं, वह पुण्य भूमि हिंदुओं की ही है और इसका नाम हिंदुस्तान ही है। इसके बावजूद हिंदू और हिंदुत्व शब्द भारत में इतने सहज सुलभ हैं कि उनके बारे में कभी भी कुछ भी बोला अर्थात ‘बका’ जा सकता है। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि हिंदू-हिंदुत्व को लेकर समय-समय पर निकृष्टतम और घृणित व्याख्याएं की जाती रही हैं। और यह सब इसलिए होता रहा है और हो भी रहा है, क्योंकि हिंदू-हिंदुत्व को सदैव गरियाते रहने वाले धूर्त नेता जानते हैं कि ऐसा करने से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। वे जानते हैं कि आज भी हिंदू अनेक विचारधाराओं तथा राजनीतिक धड़ों में बंटा हुआ है। वह कहीं धर्मनिरपेक्ष है, कहीं समाजवादी है, तो कहीं वामपंथी है। और तो और वह शूद्र है, वैश्य, क्षत्रिय एवं ब्राह्मण भी है। बस, खुद को हिंदू न मानने की जिद पाले बैठा है। शायद यही वजह है, जिसके चलते अब हिंदू-हिंदुत्व शब्द पर ही सवालिया निशान लगाए जाने लगे हैं। सवाल भी कौन उठा रहा है? वह, जिनके स्वर्गीय पिता श्री बलभद्र सिंह अपने कालखंड में ‘हिंदूपत’ की उपाधि से विभूषित हुआ करते थे और उन्हें स्वयं हिंदू होने पर गर्व था। जिस राजघराने द्वारा दशकों तक ‘हिंदूपत’ बैंक का संचालन किया जाता रहा, उस राजघराने के मुखिया हिंदू-हिंदुत्व शब्द को गैर-भारतीय बता रहे हैं। जिस राजनेता की देखरेख में ‘हिंदूपत’ नामक शैक्षणिक संस्थान की नींव रखी गई, वह नेता बता रहा है कि हिंदू-हिंदुत्व का भारतीयता से कोई लेना-देना नहीं है। जो वक्त-जरूरत खुद भी चीख-चीख कर कहता रहा कि मैं सबसे बड़ा हिंदू हूं, वह आज साबित करने पर तुला है कि हिंदू शब्द तो यहां का है ही नहीं! आप समझ ही गए होंगे कि यहां किस नेता और किस राजघराने की बात हो रही है। हम बात कर रहे हैं राघौगढ़ राजघराने के मुखिया, स्वर्गीय राजा बलभद्र सिंह के पुत्र और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री दिग्विजय सिंह की, जिन्होंने एक पत्रकार वार्ता में यह कहकर सुर्खियां बटोरीं कि हिंदू शब्द का हिंदुस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मेरा सवाल इंडी गठबंधन में शामिल उन तमाम राजनीतिक संगठनों के हिंदू भाइयों-बहनों से है, जो इतना सब सुनकर भी खामोश बने हुए हैं! क्या उनके लिए राजनीति इतनी बड़ी हो गई है कि सियासी फायदे के चलते वे यह मिथ्या आरोप भी सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं कि हिंदू और हिंदुत्व दोनों फारसी हैं? क्या एक भी कांग्रेसी, समाजवादी, वामपंथी अथवा धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाले हिंदू नेता में यह साहस शेष नहीं बचा जो दिग्विजय सिंह से पूछ सके कि जब हिंदू फारसी है तो उनके पिता ‘हिंदूपत’ क्यों थे? यदि हिंदू-हिंदुत्व भारतीय ही नहीं तो राघौगढ़ राजघराने द्वारा संचालित बैंक का नाम ‘हिंदूपत’ क्यों था? ये वे सवाल हैं जिनके जवाब दिग्विजय सिंह के हिंदू विरोधी बयानों से कलंकित हो रही राघौगढ़ की नगरी को, उसके पूर्वजों और वर्तमान वंशजों को काफी हद तक स्वच्छता प्रदान कर सकते हैं। एक निवेदन भारतीय जनमानस से भी है – उन्हें भी यह तय करना होगा कि बस, बहुत हुआ। अब हिंदू-हिंदुत्व के खिलाफ कोई बात नहीं सुनी जाएगी। (लेखक मध्य प्रदेश योग आयोग के कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त अध्यक्ष हैं)

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