फ्रांस में जनाक्रोश, व्यवस्था के सामने चुनौती

महेन्द्र तिवारी
फ्रांस वर्तमान में एक अभूतपूर्व और भीषण जन आंदोलन का सामना कर रहा है, जिसने पूरे देश के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। देश के विभिन्न प्रमुख नगरों की सड़कों पर 4 लाख से अधिक नागरिक अपनी ही सरकार के विरुद्ध उतर आए हैं। कुछ श्रमिक संगठनों का यह दावा है कि प्रदर्शनकारियों की संख्या इससे भी कहीं अधिक है। इस विशाल जनसमूह और लगातार बढ़ती उग्रता को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने 70 हजार सुरक्षाकर्मियों को देश भर में तैनात किया है। ये सुरक्षा बल स्थिति पर काबू पाने के लिए जल तोपों और अश्रु गैस का निरंतर उपयोग कर रहे हैं, फिर भी हालात सामान्य होते हुए नहीं दिख रहे हैं। यह आंदोलन केवल एक साधारण विरोध नहीं है, बल्कि यह वर्षों से जमा हो रहे सामाजिक असंतोष का परिणाम है जो अब एक विशाल ज्वालामुखी का रूप ले चुका है। इस व्यापक विरोध का मूल कारण देश की चरमराती शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है। आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से विद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों ने की थी। शिक्षा क्षेत्र में संसाधनों का भारी अभाव है और शिक्षकों के रिक्त पदों को लंबे समय से नहीं भरा जा रहा है। एक चौंकाने वाले आंकड़े के अनुसार शिक्षकों के अस्वस्थ होने या उनके उपलब्ध न होने के कारण विद्यालयों में 1 करोड़ 50 लाख शिक्षण घंटे नष्ट हो गए हैं। इस स्थिति ने विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के छात्रों के भविष्य पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। सरकार द्वारा शिक्षा कोष में की गई निरंतर कटौती ने इस आक्रोश को और अधिक भड़का दिया है, जिससे युवाओं और उनके अभिभावकों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। शिक्षा के साथ ही देश में बढ़ती महंगाई और जीवन निर्वाह की बढ़ती लागत ने आम नागरिकों की कमर तोड़ दी है। देश भर के श्रमिक, कर्मचारी और मजदूर अपने पारिश्रमिक में वृद्धि और बेहतर सेवानिवृत्ति लाभों की मांग को लेकर इस आंदोलन में कूद पड़े हैं। इस भीड़ में पीत वस्त्र धारण करने वाले वे आंदोलनकारी भी शामिल हो गए हैं, जो पहले भी सरकार की आर्थिक नीतियों के विरुद्ध लंबे समय तक बड़े प्रदर्शन कर चुके हैं। यह पूरा घटनाक्रम वर्तमान राष्ट्र प्रमुख और उनकी सरकार के प्रति गहरे अविश्वास को दर्शाता है। जनता को लगता है कि सत्ता में बैठे लोग उनकी रोजमर्रा की आर्थिक कठिनाइयों और संघर्षों को पूरी तरह से अनदेखा कर रहे हैं। शुरुआत में जो प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीकों से आरंभ हुए थे, उन्होंने बहुत ही कम समय में हिंसक रूप धारण कर लिया। कुछ उग्र और चरमपंथी समूहों ने सुरक्षाबलों पर पथराव किया और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया। अब तक पूरे देश में 3 हजार से अधिक दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की हिंसक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अराजक तत्वों ने सड़कों पर खड़े वाहनों को आग के हवाले कर दिया है। प्रशासन ने इस उपद्रव को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए हैं और अब तक 1 हजार से अधिक उपद्रवियों को हिरासत में लिया जा चुका है। सुरक्षा बलों को विशेष रूप से बख्तरबंद वाहनों और गश्ती वायुयानों का भी सहयोग प्रदान किया जा रहा है। इस अस्थिरता का गहरा प्रभाव देश के सामान्य जनजीवन और पर्यटन व्यवस्था पर भी पड़ा है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विश्व प्रसिद्ध संग्रहालयों और कला केंद्रों के द्वार दर्शकों के लिए अनिश्चित काल तक बंद कर दिए गए हैं। कई संवेदनशील नगरों में रात्रि प्रतिबंध लागू कर दिए गए हैं, ताकि रात के अंधेरे में होने वाली लूटपाट की घटनाओं को रोका जा सके। फ्रांस में उठी इस विरोध की लहर का प्रभाव अब केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं है। अन्य निकटवर्ती यूरोपीय देशों में भी नागरिक इसी तरह की आर्थिक समस्याओं और महंगाई के विरुद्ध अपनी सरकारों पर दबाव बनाने लगे हैं, जो पूरे महाद्वीप की राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
